इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: पति की जिम्मेदारी पत्नी के भरण-पोषण की समाप्त नहीं होती
महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में पति द्वारा पत्नी के खिलाफ झूठी गवाही के मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि पति की जिम्मेदारी पत्नी के भरण-पोषण की होती है, और यह दायित्व उसकी मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होता। यदि पति का निधन हो जाता है, तो पत्नी अपने ससुर की संपत्ति से भी भरण-पोषण की मांग कर सकती है।
अकुल रस्तोगी की याचिका पर सुनवाई
यह निर्णय जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने अकुल रस्तोगी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी पत्नी के खिलाफ झूठे बयान देने पर मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इनकार किया गया था। उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया।
पति के तर्क और कोर्ट की प्रतिक्रिया
सुनवाई के दौरान पति ने तर्क दिया कि उसकी पत्नी ने भरण-पोषण के दावे में कई तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया। उसने आरोप लगाया कि पत्नी ने खुद को गृहिणी बताया, जबकि वह नौकरी कर रही है। इसके अलावा, उसने अपनी वित्तीय स्थिति को लेकर भी सही जानकारी नहीं दी।
हालांकि, अदालत ने इन तर्कों को पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि पत्नी के नौकरी करने का कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया। केवल आरोप लगाने से यह साबित नहीं होता कि उसने झूठ बोला है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी दस्तावेज के केवल एक हिस्से को स्वीकार कर बाकी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का अंतिम निर्णय
फिक्स्ड डिपॉजिट के मुद्दे पर भी कोर्ट ने कहा कि यह राशि पत्नी के पिता द्वारा जमा की गई थी और शादी के बाद पिता पर उसका भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी नहीं होती। वर्तमान में पत्नी के पास सीमित धनराशि है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उसे आर्थिक सहायता की आवश्यकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि कानून के तहत पति का अपनी पत्नी के भरण-पोषण का दायित्व सर्वोपरि है। यदि पति का निधन हो जाता है, तो यह जिम्मेदारी परिवार के अन्य सदस्यों, विशेषकर ससुर पर आ सकती है। अंत में, कोर्ट ने कहा कि अपील में ऐसे कोई ठोस आधार नहीं हैं जिनसे यह साबित हो सके कि पत्नी ने जानबूझकर झूठे बयान दिए हैं। इसलिए अपील को खारिज करना उचित है।
