गुजरात विश्वविद्यालय में 'देशभक्ति का समाजशास्त्र': मोदी तत्व का अध्ययन
गुजरात के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में नया पाठ्यक्रम
गुजरात के वडोदरा में स्थित महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय ने अपने समाजशास्त्र पाठ्यक्रम में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। विश्वविद्यालय ने स्नातकोत्तर स्तर पर 'देशभक्ति का समाजशास्त्र' नामक एक नया मॉड्यूल शुरू किया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को 'मोदी तत्व' के रूप में अध्ययन का विषय बनाया गया है। इसके साथ ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास और उसके सामाजिक प्रभाव को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख डॉ. वीरेंद्र का दृष्टिकोण
समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख डॉ. वीरेंद्र सिंह ने बताया कि इस कोर्स का उद्देश्य समकालीन भारतीय समाज में नेतृत्व, राष्ट्रवाद और सामाजिक परिवर्तनों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझना है। उन्होंने कहा कि 'मोदी तत्व' के माध्यम से छात्रों को यह विश्लेषण करने का अवसर मिलेगा कि कैसे एक नेता का व्यक्तित्व, नीतियां और संचार शैली समाज पर गहरा प्रभाव डालती हैं।
डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि यह पाठ्यक्रम किसी विचारधारा का प्रचार नहीं करता, बल्कि यह एक अकादमिक अध्ययन है। उन्होंने कहा कि समाजशास्त्र में करिश्माई नेतृत्व की अवधारणा पर चर्चा होती रही है, जिसे जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने परिभाषित किया था। इसी संदर्भ में महात्मा गांधी और मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसे नेताओं का अध्ययन किया जाता है। अब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व शैली को भी समझने का प्रयास किया जाएगा।
समकालीन मुद्दों पर चर्चा
इस पाठ्यक्रम में केवल व्यक्तित्व विश्लेषण ही नहीं, बल्कि कई समकालीन मुद्दों को भी शामिल किया गया है। 'मोदी तत्व' के अंतर्गत मीडिया की भूमिका, डिजिटल राष्ट्रवाद, नागरिकता से जुड़े प्रश्न, असहमति की राजनीति, वैश्वीकरण और पहचान जैसे विषयों पर भी विस्तार से चर्चा होगी। इसका उद्देश्य यह समझना है कि आधुनिक भारत में सामाजिक और राजनीतिक विमर्श कैसे विकसित हो रहा है।
डॉ. सिंह के अनुसार, इस पाठ्यक्रम के माध्यम से छात्र यह जानने का प्रयास करेंगे कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के पीछे कौन से सामाजिक और राजनीतिक कारक काम करते हैं। इसके साथ ही, यह भी अध्ययन किया जाएगा कि उनकी नीतियों जैसे नोटबंदी, डिजिटल पहल और प्रशासनिक सुधार का समाज पर क्या प्रभाव पड़ा और लोगों के बीच उनकी स्वीकार्यता कैसे बनी।
नए मॉड्यूल का विभाजन
इस नए मॉड्यूल को चार अलग-अलग पेपर में विभाजित किया गया है, जिनमें प्रत्येक के लिए लगभग 15 घंटे का शिक्षण निर्धारित किया गया है। इस पाठ्यक्रम की अवधारणा तब विकसित हुई, जब विश्वविद्यालय के छात्र नीति आयोग से जुड़े एक प्रोजेक्ट के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वेक्षण कर रहे थे। वहां उन्हें कुछ संगठनों की सक्रियता और सामाजिक प्रभाव के बारे में जानकारी मिली, जिसके बाद इस विषय पर गहन अध्ययन की आवश्यकता महसूस हुई।
इसके अलावा, पाठ्यक्रम में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्र-राज्य की अवधारणा और वैश्विक संदर्भ में भारत की पहचान जैसे विषयों को भी शामिल किया गया है। साथ ही, ऐतिहासिक समाज सुधारकों जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज और सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय के योगदान पर भी प्रकाश डाला जाएगा, ताकि छात्र भारतीय समाज के विकास को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझ सकें।
