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गोरखपुर में यदुवंशियों के लिए ऐतिहासिक सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना

गोरखपुर में यदुवंशियों के लिए एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की जा रही है, जहां महाराज यदु की पहली प्रतिमा स्थापित की जाएगी। ओबीसी पार्टी के काली शंकर यदुवंशी ने इस पहल की घोषणा की है, जो यादव और हैहयवंशी समाज की साझा विरासत को समर्पित है। यह केंद्र अध्ययन, साधना और संगठन का एक महत्वपूर्ण स्थल बनेगा। यदुवंशियों के लिए यह एक नई पहचान और गौरव का प्रतीक होगा।
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गोरखपुर में यदुवंशियों के लिए ऐतिहासिक सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना

गोरखपुर में यदुवंश का पहला प्रेरणा केंद्र

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से एक नई सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत हुई है, जो यदुवंशियों के गर्व को पुनर्जीवित करने का कार्य करेगी। ओबीसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष काली शंकर यदुवंशी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐतिहासिक घोषणा की कि चौरी-चौरा के ब्रह्मपुर में “श्री यदु धाम पीठ” की स्थापना की जाएगी, जहां महाराज यदु की पहली प्रतिमा स्थापित की जाएगी। इसके साथ ही श्री राधा–कृष्ण और सहस्त्रबाहु अर्जुन की भव्य प्रतिमाएं भी स्थापित की जाएंगी, जो यदुवंश की वीरता और धर्म की रक्षा का प्रतीक मानी जाएंगी।

इस प्रेस वार्ता में बताया गया कि यह पीठ केवल यादव समाज के लिए नहीं, बल्कि जायसवाल (हैहयवंशी) समाज की साझा वैदिक और ऐतिहासिक विरासत का संगम बनेगा। यहां महाराज यदु के साथ-साथ श्री राधा–कृष्ण और सहस्त्रबाहु अर्जुन की प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी। यह स्थल यदुवंशी, हैहयवंशी और अन्य संबंधित वंशों के लिए अध्ययन, साधना और संगठन का एक जीवंत केंद्र बनेगा।

काली शंकर यदुवंशी ने उन राजनीतिक दलों पर भी निशाना साधा, जिन्होंने यादवों और पिछड़े वर्गों के नाम पर सत्ता का लाभ उठाया, लेकिन समाज के पूर्वजों को सम्मान दिलाने में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने कहा कि अब समाज केवल किसी का “वोट बैंक” नहीं रहेगा, बल्कि अपने सांस्कृतिक और राजनीतिक नेतृत्व का निर्धारण स्वयं करेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि यदुवंशी होना किसी पार्टी का अनुयायी होना नहीं है, बल्कि समता, साहस और सत्य का प्रतिनिधित्व करना है। यदुवंश किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है, यह एक जीवंत परंपरा है। राजनीतिक विचारधाराएं अस्थायी होती हैं, लेकिन यदुवंश की सामाजिक चेतना शाश्वत है।

काली शंकर यदुवंशी ने मीडिया को बताया कि जिस यदुकुल में भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ, उस वंश के संस्थापक महाराज यदु को इतिहास में उचित सम्मान नहीं मिला। उन्होंने बताया कि विश्व में महाराज यदु की कोई प्रतिमा नहीं है और न ही यदुवंशियों का कोई स्वतंत्र पीठ है। इसी उपेक्षा को समाप्त करने के लिए चौरी-चौरा में 11 फीट ऊंची स्वर्णमयी महाराज यदु की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। यह “श्री यदुधाम पीठ” यदुवंशियों के लिए एक अद्वितीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र होगा।

इस अभियान की प्रेरणा के बारे में काली शंकर यदुवंशी ने बताया कि उन्हें यह प्रेरणा एक अलौकिक स्वप्न से मिली, जिसमें महाराज यदु ने समाज की सांस्कृतिक उपेक्षा पर दुःख व्यक्त किया। उन्होंने इसे अपने पूर्वजों का ‘दैवीय आदेश’ मानते हुए इस महाअभियान का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि “श्री यदुधाम पीठ” केवल एक पीठ नहीं, बल्कि यदुवंश और हैहयवंश के गौरवशाली इतिहास का शोध और प्रलेखन का केंद्र होगा।