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दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल और अन्य को भेजा नोटिस, अदालती वीडियो प्रसारण पर सख्त कार्रवाई

दिल्ली उच्च न्यायालय ने आबकारी नीति मामले से जुड़े अदालती वीडियो के प्रसारण पर सख्त कार्रवाई की है। अरविंद केजरीवाल समेत कई लोगों को नोटिस जारी किया गया है। अदालत ने सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को वीडियो हटाने का आदेश दिया है। जानें इस मामले में क्या हुआ और क्यों यह कदम उठाया गया।
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दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल और अन्य को भेजा नोटिस, अदालती वीडियो प्रसारण पर सख्त कार्रवाई

दिल्ली उच्च न्यायालय का सख्त कदम


नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने आबकारी नीति से संबंधित मामले की सुनवाई का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने के लिए आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल सहित कई व्यक्तियों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को भी निर्देश दिया है कि वे तुरंत उन वीडियो को हटाएं।


सुप्रीम कोर्ट का आदेश

यह मामला दिल्ली आबकारी नीति घोटाले से जुड़ा हुआ है। 13 अप्रैल को केजरीवाल ने अदालत में पेश होकर न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा से मामले की सुनवाई से हटने की अपील की। उन्होंने लगभग 45 मिनट तक अपनी दलीलें प्रस्तुत कीं, जिसके बाद उनकी बहस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।


अदालत ने यह पाया कि बिना अनुमति के अदालती कार्यवाही को रिकॉर्ड करना और उसे सार्वजनिक करना न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए फेसबुक, गूगल, एक्स और अन्य प्लेटफार्मों को सभी संबंधित वीडियो तुरंत हटाने का आदेश दिया गया है।


केजरीवाल की याचिका खारिज

केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा से खुद को मामले से अलग करने की याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप बिना किसी ठोस सबूत के हैं।


उन्होंने कहा, “जब मैं फैसला लिखने लगा, तो अदालत में सन्नाटा था। मेरे मन में केवल संविधान की शपथ का भार था।” उन्होंने अपनी निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों को निराधार बताया।


नोटिस किसे जारी किया गया?

उच्च न्यायालय ने केजरीवाल के अलावा मनीष सिसोदिया, अन्य आप नेताओं और पत्रकार रविश कुमार को भी नोटिस जारी किया है, जिन्होंने वीडियो अपलोड या साझा किया। याचिका में अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की गई है। दिल्ली पुलिस को भी अनधिकृत वीडियो हटाने के लिए निर्देश दिए गए हैं।


यह कदम क्यों आवश्यक है?

अदालत का मानना है कि ऐसी रिकॉर्डिंग और प्रसारण से न्यायिक प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। दिल्ली हाई कोर्ट के नियमों के अनुसार, बिना अनुमति के कोर्ट की कार्यवाही को रिकॉर्ड या प्रकाशित करना वर्जित है। यह कदम न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा को बनाए रखने के लिए उठाया गया है।


अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी मामले में पक्षकार बनाया है। केजरीवाल और अन्य को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया गया है।