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दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: यमुना किनारे 91 कॉलोनियों पर बुलडोजर का खतरा

दिल्ली हाईकोर्ट ने यमुना किनारे बसी 91 कॉलोनियों पर बुलडोजर चलाने का खतरा बढ़ा दिया है। कोर्ट ने इन कॉलोनियों को 'जोन O' में अस्वीकार्य मानते हुए केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। इस मामले में लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित हो सकती है। जानें, क्या होगा इन कॉलोनियों का भविष्य और केंद्र सरकार का क्या कहना है।
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दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: यमुना किनारे 91 कॉलोनियों पर बुलडोजर का खतरा

दिल्ली में कॉलोनियों पर खतरा


नई दिल्ली: दिल्ली की यमुना के किनारे स्थित 91 कॉलोनियों पर बुलडोजर चलाने का खतरा बढ़ गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन कॉलोनियों को 'जोन O' में अस्वीकार्य मानते हुए केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। इन कॉलोनियों में लाखों लोग लंबे समय से निवास कर रहे हैं।


उच्च न्यायालय का कड़ा आदेश

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि यमुना के डूब क्षेत्र (जोन O) में किसी भी आवासीय कॉलोनी का अस्तित्व पर्यावरण और नदी के लिए हानिकारक है। जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने इस स्थिति को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया।


कोर्ट ने केंद्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय को निर्देश दिया है कि 31 दिसंबर 2026 तक लागू रोक पर जल्द निर्णय लिया जाए। मंत्रालय को सभी संबंधित विभागों से चर्चा करके हलफनामा प्रस्तुत करना होगा।


31 दिसंबर 2026 तक की रोक

केंद्र सरकार ने पहले इन 91 कॉलोनियों पर बुलडोजर कार्रवाई को 31 दिसंबर 2026 तक रोकने का निर्णय लिया था, लेकिन उच्च न्यायालय के हालिया आदेश के बाद अब सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। अदालत ने डीडीए और एमसीडी से भी पूछा है कि 'जोन O' में नए निर्माण को कैसे रोका जाएगा और पहले से मौजूद अवैध निर्माणों पर क्या कार्रवाई की गई है।


केंद्र सरकार का बयान

केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि ये कॉलोनियां और कुछ गांव कई वर्षों से अस्तित्व में हैं। यहां लगभग 5 से 6 लाख लोग निवास करते हैं, जिनके पास लगभग एक लाख घर हैं। सरकार का कहना है कि इन लोगों के पुनर्वास के लिए एक विस्तृत योजना बनानी होगी। इसके साथ ही इन कॉलोनियों को विशेष प्रावधानों के तहत संरक्षण भी दिया गया है।


हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इन कॉलोनियों को बचाया जाएगा या वहां बुलडोजर चलेगा। उच्च न्यायालय का रुख सख्त है, जबकि केंद्र सरकार पुनर्वास की बात कर रही है। अगली सुनवाई में सरकार का जवाब आने के बाद ही इस मामले का भविष्य तय होगा।


दिल्लीवासियों के लिए संवेदनशील मुद्दा

दिल्लीवासियों के लिए यह मामला अत्यंत संवेदनशील है, क्योंकि इससे लाखों परिवारों की जिंदगी प्रभावित हो सकती है। पर्यावरण संरक्षण और लोगों के आवास के अधिकार के बीच संतुलन बनाना सरकार और अदालत दोनों के लिए एक चुनौती बना हुआ है।