पश्चिम बंगाल चुनाव: वोटर लिस्ट में बदलाव से बढ़ी राजनीतिक हलचल
चुनाव से पहले वोटर लिस्ट में बदलाव
पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण के मतदान से पहले चुनावी माहौल और भी रोचक हो गया है। जिन मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए थे और जिन्होंने इसके खिलाफ अपील की थी, उनमें से कई को अब राहत मिली है। ट्रिब्यूनल के निर्णय के बाद हजारों मतदाताओं को फिर से सूची में शामिल किया गया है, जिससे चुनावी समीकरणों पर प्रभाव पड़ सकता है।
ट्रिब्यूनल का निर्णय
चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, दूसरे चरण की वोटिंग से पहले ट्रिब्यूनल ने कुल 1474 आवेदनों की समीक्षा की। इनमें से 1468 आवेदकों के नाम फिर से वोटर लिस्ट में जोड़े गए हैं, जबकि 6 आवेदनों को खारिज कर दिया गया। यह निर्णय उन लोगों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जिनका नाम विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान हटा दिया गया था और जिन्होंने न्यायिक प्रक्रिया के तहत अपील की थी।
142 विधानसभा सीटों पर मतदान
दूसरे चरण में राज्य के 7 जिलों की कुल 142 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है। इनमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भवानीपुर सीट भी शामिल है, जिस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। मतदान से पहले वोटर लिस्ट में हुए इस बदलाव को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
SIR प्रक्रिया पर विवाद
पश्चिम बंगाल में SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरुआत से ही चर्चा और विवाद का विषय रही है। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच काफी बहस और आरोप-प्रत्यारोप भी देखने को मिले। पहले चरण के मतदान, जो 23 अप्रैल को हुआ था, में भी ट्रिब्यूनल ने कुछ वोटर्स को राहत दी थी। उस समय 657 आवेदनों की जांच की गई थी, जिसमें 139 लोगों के नाम वापस जोड़े गए थे।
वोटर्स की संख्या में वृद्धि
पहले चरण की तुलना में दूसरे चरण में अधिक संख्या में वोटर्स को शामिल किया गया है। जहां पहले चरण में केवल 139 नाम जोड़े गए थे, वहीं इस बार 1468 लोगों को फिर से वोट डालने का अधिकार मिला है। इस बार खास बात यह रही कि किसी भी आवेदन को 'गलत' नहीं बताया गया, जबकि पहले चरण में बड़ी संख्या में आवेदन गलत पाए गए थे।
विवाद का कारण लाखों वोटर्स का नाम हटना
SIR प्रक्रिया के दौरान पूरे राज्य में करीब 90 लाख वोटर्स के नाम सूची से हटा दिए गए थे, जो कुल मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत है। इनमें से करीब 60 लाख लोगों को 'गैर-हाजिर' या 'मृत' की श्रेणी में रखा गया, जबकि करीब 27 लाख मामलों को ट्रिब्यूनल के सामने पेश किया गया। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि जिन लोगों की स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम समुदाय की थी।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप किया। 13 अप्रैल को कोर्ट ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि जिन वोटर्स की अपील ट्रिब्यूनल से मंजूर हो चुकी है, उनके नाम सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट में जोड़े जाएं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन लोगों की अपील पर 21 अप्रैल और 27 अप्रैल से पहले फैसला आ गया है, वे क्रमशः पहले और दूसरे चरण के मतदान में हिस्सा ले सकते हैं।
अपीलों की संख्या
राज्य में इस प्रक्रिया को लेकर 34 लाख से ज्यादा अपीलें दर्ज की गई हैं। इनमें कई लोगों ने अपने नाम हटाए जाने पर आपत्ति जताई, जबकि कुछ ने नए नाम जोड़े जाने पर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि केवल अपील लंबित होने से किसी को वोट डालने का अधिकार नहीं मिल जाता। इसके लिए ट्रिब्यूनल से मंजूरी जरूरी है।
