जून 2026 में प्रदोष व्रत: शिव भक्तों के लिए महत्वपूर्ण तिथियाँ
जून प्रदोष व्रत की तिथियाँ 2026
जून प्रदोष व्रत तिथियाँ 2026: शिव भक्तों के लिए जून 2026 का महीना आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत लाभकारी रहेगा। इस महीने में महादेव को प्रसन्न करने के लिए दो विशेष प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) का आयोजन किया जाएगा। सनातन परंपरा के अनुसार, प्रदोष काल की पूजा सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है। हरियाणा के प्रसिद्ध शिव मंदिरों, विशेषकर कुरुक्षेत्र के स्थानेश्वर महादेव में इन तिथियों के लिए तैयारियाँ प्रारंभ हो चुकी हैं। यह व्रत आम जन के लिए मानसिक शांति के साथ-साथ आर्थिक और शारीरिक समस्याओं से छुटकारा पाने का एक उत्तम अवसर प्रदान करता है।
12 जून को पहला प्रदोष व्रत, जानें शुभ मुहूर्त
जून महीने का पहला प्रदोष व्रत 12 जून, शुक्रवार को कृष्ण पक्ष में मनाया जाएगा। इस दिन का विशेष महत्व है क्योंकि यह भृगुवारा प्रदोष कहलाता है, जो पारिवारिक सुख और मानसिक तनाव से मुक्ति के लिए लाभकारी है। इस दिन प्रदोष काल की पूजा का शुभ समय शाम 07:36 बजे से रात 08:59 बजे तक रहेगा। इस समय में भगवान शिव की आराधना करने से भक्तों के जीवन से नकारात्मकता दूर होती है।
27 जून को शनि प्रदोष का महासंयोग
जून का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्रदोष व्रत 27 जून, शनिवार को शुक्ल पक्ष में आएगा। इस दिन प्रदोष तिथि के कारण इसे 'शनि प्रदोष' कहा जाएगा, जिसका धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। शनि प्रदोष का व्रत रखने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और जातकों को शनि की साढ़ेसाती और ढैया के अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है। पंचांग के अनुसार, 27 जून को पूजा का सर्वोत्तम समय शाम 06:49 बजे से रात 09:03 बजे तक निर्धारित किया गया है।
प्रदोष काल में शिव आराधना की विधि
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल (Pradosh Vrat) सूर्यास्त से लगभग डेढ़ घंटे पहले शुरू होता है और सूर्यास्त के कुछ समय बाद तक रहता है। इस पावन समय में शिवलिंग पर शुद्ध जल, गाय का कच्चा दूध और गंगाजल अर्पित करने का विधान है। महादेव की प्रिय वस्तुएं जैसे बेलपत्र, धतूरा, भस्म और सफेद फूल चढ़ाने से भक्तों की सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं। मंदिर जाकर नंदी महाराज के कान में अपनी इच्छा बताना और 'ॐ नमः शिवाय' या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना इस दिन विशेष लाभ देता है।
व्रत के नियम
प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) का पालन करने वाले श्रद्धालुओं को सूर्योदय से लेकर शाम की मुख्य पूजा संपन्न होने तक उपवास रखना होता है। इस दिन पूरी तरह से सात्विक आचरण और भोजन करने की सलाह दी जाती है। धार्मिक नियमों के अनुसार, व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के अनाज, दालें और तामसिक भोजन का सेवन वर्जित है। श्रद्धालु अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार फलाहार, दूध या केवल जल ग्रहण करके इस महाव्रत को पूरा करते हैं, जिससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
