देवी निकुंभला: शक्ति और तंत्र की देवी का रहस्य
देवी निकुंभला का परिचय
देवी निकुंभला: सनातन धर्म में आदिशक्ति को मां के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, देवी दुर्गा अपने भक्तों की रक्षा के लिए राक्षसों का वध करती हैं और उन्हें आशीर्वाद देती हैं। देवी दुर्गा के अनेक रूपों में से एक निकुंभला (प्रत्यंगिरा) देवी का स्वरूप है। मान्यता है कि दक्षिण और उत्तर भारत में निकुंभला देवी की उपासना मुख्य रूप से दक्षिण भारत में शत्रु बाधा, तंत्र-मंत्र के प्रभाव और नकारात्मक शक्तियों को समाप्त करने के लिए की जाती है।
निकुंभला देवी का उग्र रूप
निकुंभला देवी को प्रत्यंगिरा देवी का अवतार माना जाता है, जिनका मुख सिंह का और शरीर स्त्री का है। ये मां दुर्गा और तंत्र साधना की एक अत्यंत उग्र और शक्तिशाली देवी हैं। देवी भागवत महापुराण में शुम्भ-निशुम्भ के सेनापति 'निकुम्भ' नामक राक्षस के वध और देवी प्रत्यंगिरा (नारसिंही) के मूल तांत्रिक स्वरूपों का विस्तृत वर्णन है। देवी भागवत पुराण के पांचवे स्कंध में महिषासुर तथा शुम्भ-निशुम्भ वध की कथा का विस्तार से उल्लेख किया गया है।
उत्पत्ति की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, हिरण्यकश्यप के वध के बाद जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ, तब भगवान शिव ने शरभ अवतार लिया। जब दोनों महाशक्तियों के बीच युद्ध से ब्रह्मांड संकट में आया, तब आदिशक्ति ने प्रत्यंगिरा (नारसिंही) रूप धारण कर दोनों को शांत किया।
अल्मोड़ा का मंदिर
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में देवी निकुंभला का एक ऐतिहासिक मंदिर स्थित है, जहाँ इन्हें मां नारसिंही के रूप में पूजा जाता है। इस मंदिर का निर्माण चंदवंशीय राजा देवीचंद ने करवाया था।
प्रत्यंगिरा देवी का तंत्र और मंत्र विज्ञान
प्रत्यंगिरा देवी का नाम उनके उत्पत्ति तंत्र और मंत्र विज्ञान को दर्शाता है। तंत्र शास्त्र और अथर्ववेद के अनुसार, देवी की उत्पत्ति किसी गर्भ से नहीं, बल्कि दो परम तपस्वी ऋषियों की ध्यान अवस्था में उत्पन्न हुई ध्वनि तरंगों (मंत्र) से हुई थी।
'प्रति' + 'अंगिरा': इस स्वरूप को प्रकट करने वाले दो महान वैदिक महर्षि थे—ऋषि प्रत्यंगिर और ऋषि अंगिरस। इन दोनों ऋषियों ने मिलकर शून्य में गूंज रही आदि-शक्ति की ध्वनि को मंत्र रूप में डिकोड किया था, इसलिए इस शक्ति का नाम 'प्रत्यंगिरा' पड़ा। 'प्रति' का व्यावहारिक अर्थ: तंत्र में 'प्रति' का अर्थ होता है—उलट देना। यह देवी साधक पर किए गए किसी भी मारण, सम्मोहन या तांत्रिक अभिचार कर्म को पलटकर वापस भेजने की अचूक शक्ति हैं।
