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नैमिषारण्य: कलियुग से मुक्त एक पवित्र तीर्थ स्थल

नैमिषारण्य, उत्तर प्रदेश में स्थित एक पवित्र तीर्थ स्थल है, जिसे कलियुग के प्रभाव से मुक्त माना जाता है। यहां की धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं इसे विशेष बनाती हैं। जानें इस स्थान का महत्व, इसकी पवित्रता और यहां की प्रमुख घटनाओं के बारे में। क्या आप जानते हैं कि यहां 88 हजार ऋषियों ने तपस्या की थी? इस लेख में नैमिषारण्य के बारे में और जानें।
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नैमिषारण्य: कलियुग से मुक्त एक पवित्र तीर्थ स्थल

कलियुग का महत्व

कलियुग, चार युगों में अंतिम युग है और इसकी अवधि अन्य युगों की तुलना में सबसे कम मानी जाती है। वेदों और पुराणों के अनुसार, इस युग में लालच, अधर्म, हिंसा और अज्ञानता का प्रकोप रहेगा। उत्तर प्रदेश में स्थित नैमिषारण्य को एक अत्यंत पवित्र हिंदू तीर्थ स्थल माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्थान पर कलियुग का प्रभाव अभी तक नहीं पहुंचा है। इस लेख में, हम नैमिषारण्य के महत्व पर चर्चा करेंगे।


नैमिषारण्य का स्थान

नैमिषारण्य, उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में गोमती नदी के किनारे स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहां कलियुग का प्रभाव नहीं पड़ा है, जिससे यह पूरी तरह से कलियुग से मुक्त है।


इस स्थान की पवित्रता

कथाओं के अनुसार, महाभारत के युद्ध के बाद साधु-संत कलियुग की शुरुआत को लेकर चिंतित थे। उन्होंने सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी से सहायता मांगी और एक ऐसे स्थान की खोज की जो कलियुग के प्रभाव से मुक्त हो। ब्रह्माजी ने अपना 'मनोमय चक्र' छोड़ा, जो नैमिष वन में जाकर रुका। इसके बाद साधु-संतों ने इस स्थान को तपोभूमि बना लिया।


नैमिषारण्य का महत्व

महाभारत और अन्य ग्रंथों में नैमिषारण्य का उल्लेख एक घने जंगल के रूप में किया गया है, जिसे नीमषार या नैमिष के नाम से भी जाना जाता है। यह हिंदू तीर्थों में सबसे पवित्र और पहला तीर्थ स्थल माना जाता है। इसका संबंध ब्रह्माजी, भगवान विष्णु, देवी सती और महादेव से है। यहां 33 कोटि देवी-देवताओं का निवास माना जाता है। इसके दर्शन के बाद चार धाम यात्रा पूरी मानी जाती है।


यह माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति इस पवित्र भूमि पर 12 वर्षों तक तपस्या करता है, तो उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। नैमिषारण्य विशेष रूप से 84 कोस परिक्रमा के लिए प्रसिद्ध है, जिसकी शुरुआत फाल्गुन माह की अमावस्या के बाद होती है। यहां हनुमान गढ़ी, ललिता देवी मंदिर, व्यास गद्दी और चक्रतीर्थ जैसे प्रमुख स्थल भी हैं.


महत्वपूर्ण घटनाएं

नैमिषारण्य में 88 हजार ऋषियों ने तपस्या की थी, इसलिए इसे तपोभूमि भी कहा जाता है।


भगवान श्रीराम ने इसी स्थान पर अपना अश्वमेध यज्ञ पूरा किया था।


कहा जाता है कि ब्रह्माजी का चक्र इसी स्थान पर गिरा था।


लोक कल्याण के लिए ऋषि दधीचि ने यहां देवराज इन्द्र को अपनी अस्थियां दान की थीं।