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पितृ पक्ष: पिंडदान का महत्व और विधि

पितृ पक्ष एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवधि है, जिसमें दिवंगत पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और श्राद्ध की परंपरा निभाई जाती है। इस लेख में, हम पितृ पक्ष की तिथियों, पिंडदान की विधि और इसके महत्व के बारे में जानेंगे। जानें कि कैसे इस समय में पितरों को श्रद्धांजलि देकर आप अपने जीवन में सुख और समृद्धि ला सकते हैं।
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पितृ पक्ष: पिंडदान का महत्व और विधि

पितृ पक्ष और पिंडदान का महत्व


पितृ पक्ष का महत्व: सनातन धर्म में पितृ पक्ष का विशेष स्थान है। इस अवधि में, दिवंगत पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की परंपरा निभाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य जन्म से ही विभिन्न ऋणों के अधीन होता है, जिनमें देव ऋण, पितृ ऋण और ऋषि ऋण शामिल हैं। इन ऋणों का भुगतान करने के लिए विभिन्न कर्तव्यों का पालन करना आवश्यक है। पितृ पक्ष में पिंडदान के माध्यम से पितरों को सम्मानित करना और उनका ऋण चुकाना महत्वपूर्ण है।


पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान के लिए पवित्र स्नान, कुश से जनेऊ बनाना, जल चढ़ाना, पिंड दान करना और ब्राह्मणों को भोजन कराना आवश्यक है। जल अर्पित करते समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करना चाहिए। पितृ दोष से मुक्ति के लिए पितृ स्तोत्र का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। इस दौरान प्याज और लहसुन से परहेज करना और तुलसी का उपयोग करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।


पितृ पक्ष की तिथियाँ:
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष पितृ पक्ष 07 सितंबर 2025 से शुरू होगा और 21 सितंबर 2025 को समाप्त होगा।


पितरों के पिंडदान के लिए कुछ शास्त्रों में बताया गया है कि पके हुए चावल, दूध और तिल को मिलाकर पिंड बनाए जाते हैं, जिसे सपिंडीकरण कहा जाता है।


पौराणिक मान्यता के अनुसार, समय पर श्राद्ध करने से कुल में कोई दुखी नहीं रहता। पितरों की पूजा से मनुष्य को आयु, पुत्र, यश, कीर्ति, स्वर्ग, बल, श्री, सुख-सौभाग्य और धन-धान्य की प्राप्ति होती है।