शनिदेव का हनुमान जी और शिवजी के प्रति सम्मान: पौराणिक कथाएँ
शनिदेव का भक्तों पर प्रभाव
शनिदेव, जो हनुमान जी और शिवजी के अनुयायियों को अपनी निगाहों से दूर रखते हैं, के बारे में पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि हनुमान जी ने शनिदेव के अहंकार को तोड़ा और शिवजी ने उन्हें सही मार्ग दिखाया।
अंबाला. शनिवार का दिन सनातन धर्म में न्याय के देवता शनिदेव को समर्पित माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनिदेव कर्मफल दाता हैं, जो व्यक्ति को उसके अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार फल देते हैं। अक्सर लोग शनिदेव का नाम सुनते ही घबरा जाते हैं।
साढ़ेसाती और ढैय्या का डर लोगों के मन में बसा रहता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रह्मांड में दो ऐसे देवता हैं जिनके भक्तों की ओर शनिदेव कभी आंख उठाकर भी नहीं देखते? जी हां, हम संकटमोचन हनुमान और देवाधिदेव महादेव की बात कर रहे हैं। आइए जानते हैं कि शनिदेव इन दोनों से इतना क्यों डरते हैं और उनका सम्मान क्यों करते हैं।
हनुमान जी और शनिदेव का लंका संबंध
हनुमान जी और शनिदेव का लंका कनेक्शन
पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि रावण ने नवग्रहों को बंदी बना रखा है। शनिदेव भी रावण के कारागार में उल्टे लटके हुए थे। हनुमान जी ने शनिदेव को रावण की कैद से मुक्त किया।
इस उपकार के लिए शनिदेव ने हनुमान जी से वचन लिया कि वे कभी भी उनके भक्तों को नहीं सताएंगे। यही कारण है कि जब किसी पर शनि की महादशा चलती है, तो ज्योतिषाचार्य उन्हें हनुमान चालीसा पढ़ने की सलाह देते हैं।
हनुमान जी ने शनिदेव का अहंकार तोड़ा
जब पूंछ में लपेटकर तोड़ा था अहंकार
एक अन्य कथा के अनुसार, शनिदेव को अपनी शक्ति पर घमंड हो गया था। वे हनुमान जी के पास आए, जो प्रभु श्रीराम के ध्यान में लीन थे। शनिदेव ने उन्हें डराने की कोशिश की और ध्यान में बाधा डाली।
जब हनुमान जी ने उन्हें नजरअंदाज किया, तो शनिदेव ने युद्ध की चुनौती दी। बजरंगबली ने अपनी पूंछ बढ़ाकर शनिदेव को उसमें लपेट लिया। इसके बावजूद शनिदेव ने उन्हें ललकारना नहीं छोड़ा।
गुस्से में आकर हनुमान जी ने उन्हें पत्थरों पर पटकना शुरू कर दिया, जिससे शनिदेव की हालत खराब हो गई। दर्द से कराहते हुए शनिदेव ने माफी मांगी और वचन दिया कि वे भविष्य में राम और हनुमान के भक्तों के पास नहीं फटकेंगे।
महादेव का दंड
महादेव ने जब खोला तीसरा नेत्र
शनिदेव भगवान शिव के भी भक्त माने जाते हैं, लेकिन एक समय ऐसा आया जब शिवजी को शनिदेव को दंड देना पड़ा। कथाओं के अनुसार, सूर्यदेव ने शनिदेव को विभिन्न लोकों का अधिपत्य दिया था, लेकिन शनिदेव ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया।
जब सूर्यदेव की शिकायत पर शिवजी के गण शनिदेव को समझाने गए, तो उन्होंने गणों को ही हरा दिया। अंत में महादेव को युद्ध के लिए आना पड़ा। युद्ध के दौरान जब शनिदेव ने शिवजी पर अपनी वक्र दृष्टि डाली, तो महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया।
19 वर्षों का प्रायश्चित
19 साल तक पीपल पर उल्टा लटके रहे शनि
कहा जाता है कि भगवान शिव के त्रिशूल के प्रहार से शनिदेव संज्ञाशून्य हो गए थे। दंड स्वरूप महादेव ने उन्हें 19 वर्षों तक पीपल के वृक्ष पर उल्टा लटका दिया।
इन 19 वर्षों में शनिदेव ने अपनी गलती का प्रायश्चित किया और शिवजी की कठोर तपस्या की। तभी से यह माना जाता है कि जो व्यक्ति पीपल के पेड़ की पूजा करता है या भगवान शिव की आराधना करता है, शनिदेव उसे कभी कष्ट नहीं देते। यही कारण है कि शनिवार को पीपल के नीचे दीपक जलाना शुभ माना जाता है।
शनिदेव का न्याय
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित रमेश शास्त्री के अनुसार, शनिदेव न्यायप्रिय हैं। वे केवल उन्हीं को दंड देते हैं जो अधर्म के मार्ग पर चलते हैं। यदि कोई व्यक्ति हनुमान जी या शिव जी की पूजा करता है, तो उसका मन शांत रहता है और वह गलत कार्यों से बचता है।
इसलिए शनिदेव स्वतः ही ऐसे लोगों पर प्रसन्न रहते हैं। शनि को क्रूर नहीं, बल्कि एक सख्त शिक्षक माना जाना चाहिए जो हमें जीवन का पाठ पढ़ाते हैं।
