उत्तर प्रदेश में साधु संतों के बीच बढ़ता धार्मिक विभाजन
धार्मिक और सामाजिक विभाजन का संकट
उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ जो घटनाएँ घटित हो रही हैं, वे भारतीय समाज में एक गंभीर समस्या का संकेत देती हैं। यह समस्या धार्मिक और सामाजिक विभाजन की है, जिसे राजनीतिक लाभ के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है। यह पहली बार है कि देश और समाज इस प्रकार से विभाजित हो रहे हैं। पहले चुनावों के समय विभाजन सीमित होता था, लेकिन अब यह स्थायी रूप से दिखाई दे रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेता, धर्मगुरु, और साधु संत सभी राजनीतिक ध्रुवीकरण का हिस्सा बन गए हैं।
राजनीतिक लाभ के लिए विभाजन
लोग साधु, योगी और कथावाचक की जाति के आधार पर समर्थन या विरोध में खड़े हो रहे हैं। यह प्रक्रिया स्वाभाविक नहीं है, बल्कि केंद्र की सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा सुनियोजित तरीके से विभाजन को बढ़ावा दिया जा रहा है। शंकराचार्य का मामला और यूजीसी की नियमावली इसके ताजा उदाहरण हैं।
धर्मगुरुओं की भूमिका
यह दुखद है कि भारत के साधु या संत नैतिक, धार्मिक या आध्यात्मिक उत्थान के लिए काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि नफरत फैलाने वाले साधु संत चारों ओर दिखाई दे रहे हैं। इतिहास में भारत की आध्यात्मिक परंपरा कभी भी ऐसी नहीं रही। ईसाई और इस्लाम के प्रचारक भड़काऊ बातें करते थे, लेकिन हिंदू साधु संत ऐसा नहीं करते थे।
साधु संतों का राजनीतिकरण
अब साधु संत खुलकर राजनीति में शामिल हो गए हैं। वे नेताओं का समर्थन करते हैं और जाति तथा धर्म के आधार पर विभाजन की बातें करते हैं। यह स्थिति भारत को रसातल में ले जा रही है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मामला
प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ जो हुआ, वह इस गंभीर समस्या का एक उदाहरण है। उनके खिलाफ नाबालिग बच्चों के यौन शोषण के आरोप लगाए गए हैं। यह सब उनकी राजनीतिक सक्रियता से जुड़ा हुआ है।
धर्मगुरुओं की परंपरा
धर्मगुरुओं के स्नान की परंपरा धर्मगुरु ही तय करते हैं, न कि प्रशासन। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक साधु को इस तरह की सफाई देनी पड़ रही है।
भविष्य की चिंताएँ
अगर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रशासन का शिकार बन सकते हैं, तो अन्य साधु संतों का क्या होगा? यह एक गंभीर चिंता का विषय है।
