गुरु गोविंद सिंह जयंती: सिख धर्म के महान योद्धा का जीवन और योगदान
गुरु गोविंद सिंह का अवतरण और उद्देश्य
गुरु गोविंद सिंह ने देश, धर्म और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सिख समुदाय को संगठित किया और उन्हें एक सैनिक रूप में ढाला। यह माना जाता है कि धर्म और न्याय की स्थापना के लिए उनका अवतरण हुआ। उन्होंने कहा था, “मुझे परमेश्वर ने दुष्टों का नाश करने और धर्म की स्थापना के लिए भेजा है।”
गुरु गोविंद सिंह का जीवन
5 जनवरी को गुरु गोविंद सिंह जयंती मनाई जाती है। वे सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु हैं, जिनका जन्म 22 दिसम्बर, 1666 को पटना, बिहार में हुआ था। गुरु गोविंद सिंह ने सिखों के लिए ख़ालसा का निर्माण किया और यह निर्णय लिया कि अब गुरु ग्रंथ साहिब ही सिखों का गुरु होगा।
गुरु गोविंद सिंह का योगदान
गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ में ‘सिंह’ उपनाम का प्रयोग शुरू किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि गुरु की वाणी और गुरु ग्रंथ साहिब ही सिखों के लिए मार्गदर्शक होंगे। एक कुशल कवि के रूप में, उन्होंने समय के अनुसार बाणी की रचना की, जिसे बाद में ‘बेअंत बाणी’ कहा गया।
गुरु गोविंद सिंह का बचपन
गुरु गोविंद सिंह का जन्म एक उत्सव के रूप में मनाया गया। बचपन में, वे खेलकूद में रुचि रखते थे, लेकिन तलवार और धनुष-बाण से खेलने में भी उनकी दिलचस्पी थी। एक प्रसिद्ध किस्सा है कि वे एक वृद्धा के साथ शरारत करते थे, जिससे यह साबित होता है कि वे दूसरों को कष्ट नहीं देते थे।
सैन्य जीवन और शिक्षा
गुरु गोविंद सिंह को सैन्य जीवन का प्रेम अपने दादा गुरु हरगोबिंद सिंह से मिला। उन्होंने कई भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया और सिख कानून को व्यवस्थित किया। उन्होंने सिख ग्रंथ ‘दसम ग्रंथ’ की रचना की।
गुरु गोविंद सिंह का संघर्ष
गुरु गोविंद सिंह ने सिखों को धर्म, जन्मभूमि और स्वतंत्रता के लिए संगठित किया। उन्होंने जाति-भेद और सम्प्रदायवाद को समाप्त करने के लिए पांच प्यारे को एकत्रित किया। उनके नेतृत्व में सिखों ने मुग़लों और पहाड़ी जनजातियों के खिलाफ युद्ध किया।
गुरु गोविंद सिंह की विरासत
गुरु गोविंद सिंह ने अपने जीवन में धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया। उन्होंने खालसा का मार्ग अपनाया, जो भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित है।
गुरु गोविंद सिंह जयंती का महत्व
गुरु गोविंद सिंह जयंती को श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर गुरुद्वारों में भव्य कार्यक्रम आयोजित होते हैं और सामूहिक लंगर का आयोजन किया जाता है। 2026 में यह जयंती 5 जनवरी को मनाई जाएगी।
