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जगन्नाथ पुरी मंदिर की ध्वजा: एक अद्भुत परंपरा

जगन्नाथ पुरी मंदिर की ध्वजा एक अद्भुत परंपरा का प्रतीक है, जो हमेशा हवा की दिशा के विपरीत लहराती है। यह ध्वजा बदलने की प्रक्रिया न केवल एक नियम है, बल्कि एक व्रत भी है। जानें इस ध्वजा के पीछे की कहानी और क्यों इसे बदलने का अधिकार विशेष परिवार के पास है। पुरी की ध्वजा हमें यह सिखाती है कि परंपराएँ केवल देखने की चीज़ नहीं होतीं, बल्कि उन्हें जीया जाता है।
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जगन्नाथ पुरी मंदिर की ध्वजा: एक अद्भुत परंपरा

जगन्नाथ पुरी मंदिर की ध्वजा का रहस्य

पुरी। क्या आप जानते हैं कि जगन्नाथ पुरी मंदिर की ध्वजा केवल एक झंडा नहीं है, बल्कि यह एक जीवित परंपरा का प्रतीक है? यह ध्वजा हमेशा हवा की दिशा के विपरीत लहराती है, जो विज्ञान के नियमों को चुनौती देती है। समुद्र के किनारे, तेज़ हवाओं के बीच, इसका यह अनोखा व्यवहार सभी को आश्चर्यचकित करता है।

पुरी का मंदिर लगभग 45 मंजिल ऊँचा है। हर दिन, एक व्यक्ति जिसे चुनरा सेवक कहा जाता है, बिना किसी आधुनिक सुरक्षा उपकरण के, केवल रस्सियों और अपने आत्मबल के सहारे मंदिर की चोटी पर चढ़ता है और ध्वजा बदलता है। न तो हेलमेट, न हार्नेस, और न ही कोई सुरक्षा जाल। यह कार्य हर दिन किया जाता है, चाहे मौसम कैसा भी हो—चाहे गर्मी हो, बारिश, महामारी या तूफान।

कहा जाता है कि यदि किसी दिन यह परंपरा टूट जाए और ध्वजा न बदली जाए, तो मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा। इसलिए, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, यह अनुष्ठान कभी नहीं रुकता। इतिहास गवाह है कि युद्ध, अकाल, और बीमारियों के बावजूद, ध्वजा हर दिन बदली जाती है। यह केवल एक नियम नहीं, बल्कि एक व्रत है।

ध्वजा बदलने का अधिकार किसी एक व्यक्ति का नहीं होता। इसके लिए एक विशेष परिवार पीढ़ियों से जिम्मेदारी निभा रहा है। ध्वजा की बुकिंग वर्षों पहले से की जाती है। लोग अपने परिवार और मित्रों के साथ ध्वजा लेकर आते हैं, जैसे कोई बारात। ढोल, नृत्य, भजन और वेद मंत्रों के बीच ध्वजारोहण किया जाता है। बहुत से लोग इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।

पुरी की ध्वजा हमें यह सिखाती है कि कुछ परंपराएँ केवल देखने की चीज़ नहीं होतीं, बल्कि उन्हें जीया जाता है। जहाँ आधुनिक दुनिया सुविधा और सुरक्षा की तलाश में है, वहीं पुरी की ध्वजा यह संदेश देती है कि आस्था में सुविधा नहीं, बल्कि समर्पण होता है। शायद इसी कारण पुरी केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है कि जब तक परंपरा जीवित है, संस्कृति भी जीवित है।