प्रयागराज माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विवाद
प्रयागराज माघ मेला में संगम स्नान का विवाद
प्रयागराज में मौनी अमावस्या पर संगम स्नान को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, नई दिल्ली: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर चर्चा में हैं। प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान के लिए प्रशासन के साथ उनका टकराव हो गया। यह विवाद इतना बढ़ गया कि साधु-संत, प्रशासन और राजनीति के बीच तनाव उत्पन्न हो गया। यह पहली बार नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवादों में आए हैं।
उनकी स्पष्ट राय और सनातन परंपराओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पहले भी चर्चा का विषय बना चुकी है। आइए जानते हैं कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती कौन हैं, जिनके एक निर्णय ने माघ मेले को विवादों में डाल दिया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म और शिक्षा
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का असली नाम उमाशंकर उपाध्याय है। उनका जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ। वे एक ब्राह्मण परिवार से हैं और उनकी प्रारंभिक शिक्षा प्रतापगढ़ में हुई। बचपन से ही उनका झुकाव धार्मिक और बौद्धिक विषयों की ओर था।
गुजरात से वाराणसी तक का सफर
उच्च शिक्षा और धार्मिक अध्ययन के लिए वे गुजरात गए, जहां उनका संपर्क स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी राम चैतन्य से हुआ। उनके मार्गदर्शन में उन्होंने संस्कृत और शास्त्रों का अध्ययन किया। इसके बाद वे वाराणसी आए और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की उपाधि प्राप्त की। इस दौरान वे छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का संन्यास
संस्कृत, वेद, पुराण, उपनिषद, वेदांत, आयुर्वेद और शास्त्रों की गहन शिक्षा के बाद, 1990 के दशक में उन्होंने संन्यास लिया। स्वामी करपात्री जी की सेवा में रहते हुए, उन्होंने ज्योर्तिमठ के पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से भी संपर्क किया। 15 अप्रैल 2003 को उन्हें दंड संन्यास की दीक्षा दी गई और तब से वे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के नाम से जाने जाते हैं।
धर्म और पर्यावरण के मुद्दे
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद केवल धार्मिक नेता नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलनों के भी समर्थक रहे हैं। 2008 में उन्होंने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग को लेकर अनशन किया। इसके अलावा, जोशीमठ में भूमि धंसाव के मामले में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
उनका दृष्टिकोण केवल धार्मिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे पर्यावरण के प्रति भी सजग हैं।
ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य का विवाद
सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योर्तिमठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया। इस पद को लेकर विवाद और कानूनी पेच सामने आए हैं।
प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन विवाद तब बढ़ा जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने 200 शिष्यों के साथ संगम स्नान के लिए निकले। प्रशासन ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका, जिसके बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई। स्वामी ने संगम स्नान से इनकार कर दिया और धरने पर बैठ गए।
शंकराचार्य पद की वैधता पर सवाल
मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य पद की वैधता पर सवाल उठाया है, यह कहते हुए कि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। स्वामी का कहना है कि इस पद का निर्णय अदालत या राजनीति नहीं, बल्कि धर्मपीठ और परंपराएं करती हैं।
