ब्रह्माण्ड में मानवता की खोज: जिज्ञासा और प्रतिस्पर्धा का सफर
ब्रह्माण्ड में मानवता की खोज
क्या ब्रह्माण्ड में मनुष्य (होमो सेपियन) जैसा कोई अन्य जीव है? यह सवाल शायद इस सदी या अगली सदी में हल हो सकेगा। हो सकता है कि कहीं और भी ऐसे जीव हों, जिनमें रावण जैसा अहंकार और राम जैसी विनम्रता हो। पृथ्वी के समान एक अद्भुत ग्रह। मनुष्य ने स्वर्ग और नर्क की अवधारणाएं बनाई हैं, देवताओं के लोक की कल्पना की है। लेकिन अब यह स्पष्ट हो चुका है कि अंतरिक्ष यान को पृथ्वी के कक्ष से चंद्रमा तक पहुंचने में भारी प्रयास करना पड़ता है, तो एक सांस की आत्मा का नरक या जन्नत में जाने का विचार कैसे संभव है!
एक ही सत्य उभरता है - जीव, शरीर, आत्मा अंततः अपनी मिट्टी में विलीन होते हैं। वही मिट्टी, जिससे चंद्रमा, मंगल, शनि और अन्य खगोलीय पिंड बने हैं।
हालांकि, अनंत ब्रह्माण्ड में कहीं न कहीं 'पृथ्वी जैसी' कोई जगह अवश्य होगी, जहां जीवन मौजूद है। सवाल यह है कि क्या वहां भी मनुष्य जैसी प्रवृत्ति वाले जीव होंगे? वे जीव, जिन्होंने पृथ्वी को सहस्राब्दियों से एक प्रयोगशाला बना रखा है। होमो सेपियन की पहचान यह है कि वह केवल जीता नहीं, बल्कि जांचता है; केवल अनुभव नहीं करता, बल्कि प्रश्न करता है; केवल देखता नहीं, बल्कि अर्थ गढ़ता है और सत्य की खोज में खो जाता है। लेकिन अंत में, गंवार मनुष्यों की कमान से 'सत्यमेव जयते' करते-करते अहंकारी हो जाता है।
ऐसी प्रयोगशाला का आधुनिक नाम अमेरिका है! एक ऐसा स्थान, जो कभी मजाक लगता है और कभी अद्भुत। वर्तमान में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बाड़े के रक्षक हैं। एक दिन वह सभ्यता के विनाश की बात करते हैं और अगले दिन चंद्रमा पर सभ्यता बसाने के मिशन से झूमते हैं। यह विरोधाभास आकस्मिक नहीं है; यह मानव जाति की मूल प्रकृति है, विनाश और निर्माण का साथ-साथ चलना। वही हाथ जो बम बनाते हैं, वही रॉकेट भी बनाते हैं। वही दिमाग जो युद्ध की रणनीति बनाता है, वही ब्रह्माण्ड की दूरी भी नापता है।
पिछला सप्ताह अद्भुत था! पृथ्वी पर बमबारी की तस्वीरें और चंद्रमा की ओर बढ़ता आर्टेमिस मिशन। मेरी स्मृति में एक पुरानी घटना ताजा हो गई। मैं तब छोटा था, लेकिन मुझे याद है 22 जुलाई 1969 का अखबार, जिसमें 'नई दुनिया' के संपादक राजेंद्र माथुर की 'वामन का एक डग' शीर्षक से विवेचना थी कि मनुष्य ने यदि देवताओं जैसा कोई काम किया है, तो वह चांद को छूने का काम है। यह होमो सेपियन के होमो डायस (देवता) बनने की शुरुआत थी। चांद पर पहला कदम रखने वाले नील आर्मस्ट्रांग और अपोलो अभियान तब मेरे 'जनरल नॉलेज' का हिस्सा बने।
पचपन-साठ साल बाद की ताजा चंद्र यात्रा आंखों के सामने 'लाइव' घटी है। आर्टेमिस मिशन के अंतरिक्ष यात्री, उनका यान, उनकी बातचीत - सब कुछ इतना स्पष्ट था, जैसे आमने-सामने बात हो रही हो। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि पृथ्वी और चंद्रमा के बीच सिग्नल का अंतर अब महज 1.3 सेकंड है। वह दूरी, जिसे इंसान ने सहस्राब्दियों तक मिथकों में नापा, अब सेकंडों में सिमट गई है!
सवाल है - यह सब कैसे हुआ? और इससे भी बड़ा सवाल - यह हमें कहां ले जा रहा है?
पहला उत्तर है जिज्ञासा। मनुष्य का दिमाग स्थिर नहीं रहता। वह अज्ञात को जानने की कोशिश करता है, यानी सत्य को जानने में पृथ्वी और प्रकृति को समझते हुए अंतरिक्ष में दौड़ रहा है। इसलिए मनुष्य के होने का अर्थ ही जानना और खोजना है। इसी जिज्ञासा ने उसे हौसला दिया। गुफाओं से निकलकर पूरी पृथ्वी पर फैल गया। अब वह अंतरिक्ष को भेद रहा है। जिज्ञासा पहला कारक है। दूसरा कारक प्रतिस्पर्धा है।
रास्ता कैसे बना? ताजा उदाहरण सामने है। चांद की कल्पना में जीते-जीते मानव ने कौतुक और जिज्ञासा में अज्ञात का सत्य याकि चंद्रमा पर पांव धर दिया। आर्टेमिस यान की यात्रा के सिलसिले में 'अल जजीरा' चैनल पर पुराना नाम याद आया। रिपोर्ट थी कि आर्टेमिस मिशन की जड़ यूरी गागरिन की अंतरिक्ष यात्रा है! सबसे पहले सोवियत संघ ने यूरी गागरिन को अंतरिक्ष में भेजा था। उसकी प्रतिस्पर्धा से फिर अमेरिका का अपोलो अभियान बना।
आज की हकीकत यह है कि अमेरिका हर मायने में चंद्रमा पर मानव बस्ती के लिए पानी, हीलियम-3 और अंतरिक्ष में ईंधन बनाने की संभावनाओं में आगे बढ़ रहा है। यह सब जिज्ञासा और प्रतिस्पर्धा की दो चाबियों के कारण संभव हुआ है। आर्टेमिस की चंद्र यात्रा को नासा के वैज्ञानिकों और तकनीशियनों ने जिस बारीकी से संपन्न किया है, उसे देखते हुए मुझे लगा कि यह यात्रा आज तो पूरी तरह मानवजनित है, लेकिन कुछ ही वर्षों में यह एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) से ऑटो मोड में संपन्न होगी।
मतलब आज यात्रा मनुष्य के हाथों संचालित है, लेकिन कल मशीन के निर्णयों से चलेगी। अंतरिक्ष यान अपने रास्ते खुद तय करेंगे, चंद्रमा पर उतरने की जगह खुद चुनेंगे, और खराबियों का समाधान भी खुद निकालेंगे। मिशन कंट्रोल धीरे-धीरे इंसान से मशीन के पास जाएगा। चंद्रमा पर एक ऐसा 'ड्राइवर-विहीन' इकोसिस्टम उभरेगा, जहां मनुष्य पायलट नहीं, पर्यवेक्षक या यात्री होगा। वह समय दूर नहीं, जब विमान, एयरपोर्ट की तरह स्पेसपोर्ट बनेंगे और ट्रैवल एजेंट पटना के बस अड्डे की तरह शोर करेंगे - आओ बैठो अंतरिक्ष की बस में!
फिलहाल चंद्र यात्रा पूरी तरह मनुष्य द्वारा संचालित है, लेकिन यह बहुत जल्दी पूरी तरह मनुष्य विहीन हो सकती है। यहीं बड़ा दार्शनिक संकट है। ऐसा हुआ तो क्या मनुष्य अपनी ही बनाई प्रक्रिया से अप्रासंगिक नहीं हो जाएगा?
मेरा मानना है - यह संभव नहीं है। मनुष्य बुद्धि से बने यान, अंतरिक्ष की सटीक पैमाइश, दूरी, प्रक्रिया और मुकाम, सभी मानव निर्मित हैं। तो एआई भले उसकी कोडिंग करके अंतरिक्ष टैक्सी का धंधा बना दे, लेकिन मूल में प्रगति मानवकृत शोध, फ्लोचार्ट, वर्कफ्लो से ही आगे बढ़ती रहेगी।
दरअसल, होमो सेपियन की असली पहचान उपलब्धियां नहीं, बल्कि उसकी निरंतर बेचैनी है, अज्ञात को जानने की बेचैनी। यही बेचैनी उसे उड़ाती है। मनुष्य को इस उड़ान की जहां-जहां स्वतंत्रता मिली, वहां सभ्यताएँ बनीं और खिलीं। जहां बाद में सभ्यता अहंकार, वर्चस्व, जुगाड़ और निरंकुशता में फंसी, वे क्रमशः मिट्टी में मिलती गईं।
यही राम और रावण की अजब वृत्ति का मामला है, जो पता नहीं ब्रह्माण्ड में कहीं है या नहीं? इस मनुष्य विचित्रता में ही पृथ्वी पर, उसके साढ़े आठ अरब लोगों के भविष्य में एआई के विकास और खतरे दोनों हैं। मनुष्य में जैसे संयम और अति, सत्य और अहंकार का घोल है, वैसा ही एआई बना हुआ होगा। इसका मतलब है कि यदि मनुष्य स्वभाव के तौर पर ट्रंप जैसी दिमागी बुनावट का है, तो वैसा ही एआई का भी विकास होगा। तब मानवता के लिए इसके खतरे मामूली नहीं होंगे।
और प्रयोगशाला एकमेव अमेरिका है! उसकी मूल प्रवृत्ति, बुनावट ही मनुष्य जिज्ञासा की अभिनव प्रयोगशाला है। क्योंकि यह अकेला देश है जहां मानव बुद्धि का स्वतंत्रता से अनंत में उड़ना है। फिर भले उसमें कोई सभ्यता का ध्वंस करने का पागलपन दिखाए, वैज्ञानिक, उद्यमी लोग संस्थाएं, मीडिया, सुप्रीम कोर्ट, संसद अपने-अपने मिशन बनाएंगे। चांद में सभ्यता बनाएं। इसलिए, एक तरफ एआई में देश के हथियार कार्यक्रम की मददगार कंपनियां हैं, तो दूसरी ओर ऐसी भी सुपरफास्ट एआई कंपनी है, जो पेंटागन, रक्षा मंत्रालय से कहती है कि हम तुम्हारे लिए काम नहीं करेंगे!
मशीनें स्वतंत्र नहीं होतीं; वे अपने निर्माता की प्रवृत्ति का विस्तार होती हैं। वही मनुष्य सतरंगी विचित्रता वाला जीव है। इसमें सुखद बात यह है कि भीड़, भेड़चाल वाले लोगों की बहुलता के बावजूद कुछ लोग ऐसे स्वयंभू पुरुषार्थी सदा जिंदा रहे हैं, जो चाकरी, नौकरी से परे निर्भीक जिंदा रहे हैं। वे किसी भी एल्गोरिद्म में न ढले और न बंधे। मनमौजी रहे। बुद्धि-ज्ञान की ऋषि फकडता में जिंदा रहे। ऐसे ही लोगों की बदौलत मानव सभ्यता में उछाल की क्रांतियां हुईं। इतिहास के बंधक एल्गोरिद्मों के बावजूद स्वतंत्र जिजीविषा की मानव जिंदादिली उड़ती रही और उड़ती हुई है!
