मणिकर्णिका घाट: जानें क्यों जलती रहती है इसकी अग्नि
माता पार्वती का श्राप
मणिकर्णिका घाट, नई दिल्ली: काशी नगरी में कुल 84 घाट हैं, लेकिन मणिकर्णिका घाट का महत्व अद्वितीय है। इसे विश्व का सबसे बड़ा श्मशान घाट माना जाता है। यहां की सबसे अनोखी बात यह है कि इसकी आग कभी बुझती नहीं। क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे का रहस्य क्या है? क्या यह केवल शवों की अधिकता है या फिर कोई पौराणिक कथा?
अक्षय दीप
मणिकर्णिका घाट के बारे में एक प्रमुख धार्मिक मान्यता है कि यहां एक अक्षय दीप जलता रहता है। भक्तों का मानना है कि यह ज्योति भगवान शिव द्वारा प्रज्वलित की गई थी। यहां होने वाले हर दाह संस्कार के लिए अग्नि इसी पवित्र स्रोत से ली जाती है। दिन या रात, इसी ज्योति से मुखाग्नि दी जाती है, जिससे यह दिव्य लौ कभी शांत नहीं होती। आइए, इसके पीछे के रहस्य को समझते हैं।
माता पार्वती का श्राप
मणिकर्णिका घाट का नामकरण भी एक पौराणिक कथा से जुड़ा है। कहा जाता है कि माता पार्वती यहां स्नान कर रही थीं, तभी उनकी कान की बाली कुंड में गिर गई। जब वह बाली नहीं मिली, तो माता पार्वती ने श्राप दिया कि इस घाट पर चिता की अग्नि कभी नहीं बुझेगी। तब से आज तक यहां शवों का आना और दाह संस्कार का सिलसिला जारी है।
हर रोज कितने शवों का होता है अंतिम संस्कार?
धार्मिक मान्यताओं के अलावा, वास्तविकता में मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के लिए आने वाले शवों की संख्या अधिक होती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां प्रतिदिन 30 से 35 चिताएं जलती हैं, और कभी-कभी यह संख्या बढ़ भी जाती है।
इससे शवों का आना 24 घंटे जारी रहता है। जैसे ही एक चिता शांत होती है, दूसरी चिता तैयार हो जाती है। यही कारण है कि इस घाट की जमीन कभी ठंडी नहीं होती और यहां की आग हमेशा जलती रहती है।
मोक्ष का द्वार है मणिकर्णिका
हिंदू धर्म में माना जाता है कि मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार होने से आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है और सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि देश-विदेश से लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार यहां करने की इच्छा रखते हैं।
