मोहन भागवत: स्थायी शांति के लिए एकता और अनुशासन आवश्यक
मोहन भागवत का महत्वपूर्ण बयान
मोहन भागवत, मुंबई: पश्चिम एशिया में पिछले 21 दिनों से चल रहे गंभीर संघर्ष के बीच, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि स्थायी शांति केवल अनुशासन, एकता और धर्म के पालन से ही संभव है। उन्होंने कहा कि बंदूकें और मिसाइलें शांति स्थापित नहीं कर सकतीं। भागवत ने यह बयान शुक्रवार को महाराष्ट्र के नागपुर में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्यालय की आधारशिला रखने के दौरान दिया।
भारत का सद्भाव में विश्वास
भागवत ने बताया कि दुनिया में संघर्षों के पीछे स्वार्थ और वर्चस्व की चाह होती है, लेकिन स्थायी शांति केवल एकता, अनुशासन और धर्म के पालन से ही संभव है। उन्होंने कहा कि पिछले 2000 वर्षों में दुनिया ने युद्धों के समाधान के लिए कई प्रयास किए हैं, लेकिन सफलता बहुत कम मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत हमेशा सद्भाव में विश्वास करता है, और यही कारण है कि ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष समाप्त करने के लिए भारत की मदद की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
मानवता के नियमों का पालन
संघ प्रमुख ने कहा कि भारतीय लोग हमेशा मानवता के नियमों का पालन करते हैं, जबकि अन्य देशों में जंगल के कानून का पालन होता है। उन्होंने कहा कि विश्व के कई देशों में व्याप्त अस्थिरता को धर्म के आधार पर संतुलित करना हमारा कार्य है।
धर्म परिवर्तन और असहिष्णुता की समस्या
आरएसएस प्रमुख ने वर्तमान में जबरन धर्म परिवर्तन, धार्मिक असहिष्णुता और ऊंच-नीच की भावनाओं की मौजूदगी की बात की। उन्होंने कहा कि धर्म केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह लोगों के व्यवहार में भी दिखना चाहिए। भागवत ने बताया कि भारत का प्राचीन ज्ञान हमें सिखाता है कि सभी लोग आपस में जुड़े हुए हैं। नैतिक मूल्यों और अनुशासन का पालन करने के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है, जिसमें व्यक्तिगत परेशानियाँ भी आ सकती हैं।
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