सिजोफ्रेनिया: मानसिक स्वास्थ्य की जटिलता और उसके प्रभाव
सिजोफ्रेनिया: एक गंभीर मानसिक बीमारी
चंडीगढ़, 20 मई। आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, फिर भी कुछ मानसिक बीमारियों के प्रति भ्रांतियाँ और डर कायम हैं। हाल ही में ट्विशा शर्मा के मामले ने 'सिजोफ्रेनिया' को चर्चा का विषय बना दिया है। इस घटना के बाद, लोग इंटरनेट पर इस बीमारी के बारे में जानकारी जुटा रहे हैं, जैसे कि इसके कारण और क्या इससे प्रभावित व्यक्ति सामान्य जीवन में लौट सकता है। इस विषय पर मनोचिकित्सक डॉ. सामंत दर्शी ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों को साझा किया है।
सिजोफ्रेनिया का प्रभाव और लक्षण
डॉ. सामंत दर्शी के अनुसार, सिजोफ्रेनिया एक जटिल मानसिक विकार है जो व्यक्ति की सोचने और समझने की क्षमता को प्रभावित करता है। इस बीमारी की गंभीरता तब बढ़ जाती है जब मरीज वास्तविकता और कल्पना के बीच का अंतर खो देता है। ऐसे में, व्यक्ति को अक्सर ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं या दृश्य दिखाई देते हैं जो वास्तविक नहीं होते। कई बार मरीज को यह महसूस होता है कि कोई उनका पीछा कर रहा है या उनके खिलाफ साजिश हो रही है।
युवाओं में सिजोफ्रेनिया का खतरा
चिकित्सकीय आंकड़ों के अनुसार, सिजोफ्रेनिया के प्रारंभिक लक्षण सामान्य तनाव या मूड स्विंग्स के समान होते हैं, जिससे लोग इसे पहचान नहीं पाते। यह बीमारी आमतौर पर किशोरावस्था के अंत या युवावस्था में प्रकट होती है, विशेषकर 16 से 30 वर्ष की आयु के बीच। इसके मुख्य कारणों में आनुवंशिकता, दिमाग में रासायनिक परिवर्तन, मानसिक तनाव, नशीली दवाओं का सेवन और गर्भावस्था के दौरान जटिलताएँ शामिल हैं।
सिजोफ्रेनिया और भ्रांतियाँ
डॉ. सामंत दर्शी ने बताया कि सिजोफ्रेनिया को 'डबल पर्सनालिटी' समझना गलत है। चिकित्सा विज्ञान में इसे 'डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर' कहा जाता है, जो एक अलग विकार है। फिल्मों और सोशल मीडिया में सिजोफ्रेनिया के मरीजों को अक्सर हिंसक दिखाया जाता है, जबकि वास्तविकता में वे खुद अपने डर और समाज के भेदभाव से पीड़ित होते हैं। सही समय पर उपचार से इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
इलाज में देरी का खतरा
इस बीमारी में सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब लोग सामाजिक डर के कारण मनोचिकित्सक के पास नहीं जाते। इलाज में देरी से मरीज सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ जाता है। डॉ. दर्शी ने कहा कि सिजोफ्रेनिया का मतलब यह नहीं है कि उम्मीद खत्म हो गई है; कई लोग इस बीमारी के बावजूद सामान्य जीवन जीते हैं। परिवार की भूमिका इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होती है।
ट्विशा शर्मा मामले का विश्लेषण
ट्विशा शर्मा मामले में सिजोफ्रेनिया का जिक्र तब हुआ जब उनके ससुराल वालों ने कहा कि वे मानसिक रूप से अस्वस्थ थीं। दूसरी ओर, उनके परिवार ने इन दावों को खारिज किया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है और अभी तक किसी मानसिक बीमारी की पुष्टि नहीं हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना ठोस मेडिकल रिपोर्ट के किसी को मानसिक रोगी करार देना गलत है।
