सुप्रीम कोर्ट की पितृत्व अवकाश पर महत्वपूर्ण टिप्पणी: पिता की भूमिका को मान्यता देने की आवश्यकता
पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) के महत्व पर जोर देते हुए केंद्र सरकार से इसे सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने पर विचार करने का आग्रह किया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि बच्चे के विकास में पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि मां की।
यह टिप्पणी जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ द्वारा एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई। यह मामला उस नियम से संबंधित था, जिसमें गोद लेने वाली मां को केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर मातृत्व अवकाश दिया जाता था।
गोद लेने वाली माताओं को 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश
अदालत ने इस प्रावधान को खारिज करते हुए कहा कि गोद लेने वाली माताओं को भी बच्चे की उम्र की परवाह किए बिना 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए। इसे समानता और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप बताया गया।
पिता की भूमिका को नजरअंदाज करना अनुचित
पीठ ने कहा कि बच्चे के भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक विकास में मां की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन पिता की भूमिका को नजरअंदाज करना उचित नहीं है। माता-पिता बनना एक साझा जिम्मेदारी है, जिसमें दोनों की समान भागीदारी आवश्यक है।
बच्चे के प्रारंभिक विकास में दोनों की मौजूदगी आवश्यक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे के जीवन के पहले महीने और वर्ष बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान माता-पिता और बच्चे के बीच मजबूत भावनात्मक संबंध बनते हैं। यदि पिता को इस समय बच्चे के साथ रहने का अवसर नहीं मिलता, तो यह अनुभव अधूरा रह जाता है।
मां के लिए पिता का सहयोग आवश्यक
अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे के जन्म या गोद लेने के शुरुआती समय में पिता का सहयोग मां के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। पितृत्व अवकाश मिलने से पिता परिवार की जिम्मेदारियों में सक्रिय भागीदारी निभा सकते हैं और मां का सहयोग कर सकते हैं।
लैंगिक समानता को बढ़ावा
पीठ ने कहा कि पितृत्व अवकाश लागू होने से समाज में यह धारणा बदलेगी कि बच्चों की देखभाल केवल महिलाओं की जिम्मेदारी है। इससे कार्यस्थल और परिवार दोनों में लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा। अदालत ने यह सुझाव भी दिया कि पितृत्व अवकाश की अवधि ऐसी होनी चाहिए, जो माता-पिता और बच्चे की जरूरतों के अनुरूप हो, ताकि पिता भी बच्चे के प्रारंभिक विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
