पामुक्कले: रहस्यमय प्राकृतिक सौंदर्य और 'नरक का द्वार'
पामुक्कले का अनोखा सौंदर्य
नई दिल्ली: दुनिया में कई ऐसी अद्भुत जगहें हैं, जो न केवल अपनी सुंदरता के लिए जानी जाती हैं, बल्कि रहस्यमय कहानियों से भी भरी होती हैं। तुर्की के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित पामुक्कले, इन्हीं में से एक है, जिसे प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा उदाहरण माना जाता है। यहां की सफेद चमकती ट्रैवर्टाइन सीढ़ियां और गर्म पानी के तालाब हर साल हजारों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
कपास के महल का नाम
दूर से देखने पर यह स्थल कपास के ढेर जैसा प्रतीत होता है, इसलिए इसे 'कपास का महल' भी कहा जाता है। पामुक्कले की ये अद्भुत सीढ़ियां और तालाब ज्वालामुखी गतिविधियों के कारण बने गर्म पानी से उत्पन्न हुए हैं। बारिश का पानी जमीन में रिसकर, मैग्मा से गर्म होकर चूना पत्थर से खनिज घोल लेता है, जो सतह पर आने पर जमकर ट्रैवर्टाइन चट्टान बनाता है।
नरक का द्वार
ज्वालामुखी गतिविधियों के कारण उत्पन्न गर्म झरनों से कार्बन डाइऑक्साइड एक गुफा में जमा हो गया, जिसे प्राचीन काल में प्लूटो का द्वार माना जाता था। इस गुफा में प्रवेश करने वाले जीव अक्सर तुरंत मर जाते थे, इसलिए इसे 'नरक का द्वार' भी कहा जाता है।
थर्मल पूल और प्राचीन शहर
यहां का पानी 19 से 57 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। इन थर्मल पूलों के ऊपर प्राचीन ग्रीको-रोमन शहर हिएरापोलिस बसा हुआ है, जिसे यूनेस्को ने 1988 में विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी थी। पास में क्लियोपेट्रा पूल भी है, जहां पर्यटक तैर सकते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के टेरा उपग्रह ने 25 मई 2021 और 9 अक्टूबर 2021 को इस क्षेत्र की तस्वीरें ली थीं। एस्टर सेंसर पृथ्वी की सतह के तापमान और पर्यावरणीय परिवर्तनों का अध्ययन करने में सहायक है।
पामुक्कले का भूगर्भीय इतिहास
पामुक्कले क्षेत्र में ट्रैवर्टाइन का जमाव कम से कम 6 लाख वर्षों से चल रहा है। हालांकि, अधिकांश सफेद चट्टानों का निर्माण पिछले 50 हजार वर्षों में हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि आज जो गर्म पानी के झरने और ट्रैवर्टाइन पूल हैं, उनकी वर्तमान व्यवस्था सातवीं शताब्दी में आए भूकंप के बाद बनी थी।
जलवायु परिवर्तन
समय के साथ इस क्षेत्र का तापमान भी बदलता रहा है। गर्म पानी वाले झरनों से कैल्साइट ट्रैवर्टाइन बनता है, जबकि कम तापमान पर अधिक छिद्रपूर्ण टूफा जमाव होता है। वैज्ञानिकों के भू-रासायनिक विश्लेषण से पता चलता है कि प्लाइस्टोसीन युग के बाद पानी का तापमान धीरे-धीरे कम हुआ है।
