मिस्र की अर्थव्यवस्था और ईरान के साथ जटिल संबंध
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने कई देशों को कठिनाई में डाल दिया है। कई राष्ट्र खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन करने से बच रहे हैं। हाल ही में, सऊदी अरब, मिस्र, तुर्की और सोमालिया एक नए सैन्य गठबंधन की योजना बना रहे थे, लेकिन खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों ने उनकी स्थिति को जटिल बना दिया है। मिस्र, जो हमेशा अमेरिका के संकटों में साथ रहा है, अब खुद को असमंजस में पा रहा है।
मिस्र की नाजुक आर्थिक स्थिति
मिस्र की अर्थव्यवस्था इस समय बेहद कमजोर स्थिति में है। वैश्विक ईंधन की अनिश्चितता का असर यहां भी महसूस किया जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले हर टैंकर पर ईरान की नजर है। ऐसे में, मिस्र ईरान की आलोचना करने का जोखिम नहीं उठा सकता, भले ही उसे खाड़ी देशों से आर्थिक सहायता मिलती रही हो। इसके अलावा, अगर मिस्र ने ईरान से सीधी बातचीत की, तो सऊदी अरब और अन्य खाड़ी सहयोगी नाराज हो सकते हैं।
महंगाई और ऊर्जा संकट
कोविड-19 महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण मिस्र में महंगाई बढ़ गई है। स्वेज नहर से मिलने वाला राजस्व भी हूती विद्रोहियों के हमलों से प्रभावित हुआ है। अगर हूती विद्रोही बाब अल मंडेब जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी देते हैं, तो इससे मिस्र की आय में और कमी आ सकती है। यही कारण है कि मिस्र खाड़ी देशों के साथ एकजुटता नहीं दिखा पा रहा है और ईरान का खुलकर विरोध नहीं कर सकता।
ऊर्जा संकट का प्रभाव
ईरान के युद्ध के कारण मिस्र भीषण ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है। बिजली की कटौती की जा रही है, और ऊर्जा आयात बिल जनवरी में 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर मार्च में 2.5 अरब डॉलर हो गया है। सरकार को ईंधन की कीमतों में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि करनी पड़ी है। सरकारी वाहनों को 30 प्रतिशत कम ईंधन आवंटित किया जा रहा है, और स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी में 50 प्रतिशत की कमी की गई है।
मिस्र के लिए संभावित खतरे
मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल-सिसी ने हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति से बातचीत की, जिसमें तनाव कम करने पर जोर दिया गया। मिस्र ने पाकिस्तान के साथ मिलकर ईरान के साथ युद्धविराम पर चर्चा की। विदेश मंत्री अब्देलट्टी ने इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई। सिसी ने ट्रंप से भी बात की, यह कहते हुए कि केवल वे ही युद्ध को रोक सकते हैं।
मिस्र की सरकार ईरान के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन इससे खाड़ी देशों के सहयोगियों की नाराजगी बढ़ सकती है। संयुक्त अरब अमीरात ने मिस्र में सबसे अधिक विदेशी निवेश किया है। अगर मिस्र ने ईरान के पक्ष में कोई कदम उठाया, तो खाड़ी देश अपनी निवेश राशि निकाल सकते हैं।
