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अमेरिकी सीनेट में गर्भपात पर बहस: भारतीय-अमेरिकी डॉक्टर का जोरदार बचाव

हाल ही में अमेरिकी सीनेट में गर्भपात दवाओं पर एक महत्वपूर्ण बहस हुई, जिसमें भारतीय-अमेरिकी डॉक्टर डॉ. निशा वर्मा ने अपनी गवाही दी। सीनेटर जोश हॉली के साथ उनकी तीखी नोकझोंक ने इस मुद्दे को और भी गरमा दिया। डॉ. वर्मा ने गर्भपात दवाओं की सुरक्षा का समर्थन किया, जबकि हॉली ने उनके तर्कों को चुनौती दी। इस बहस में लैंगिक पहचान और चिकित्सा वास्तविकताओं पर भी चर्चा हुई। जानें इस बहस के प्रमुख बिंदु और डॉ. वर्मा का दृष्टिकोण।
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अमेरिकी सीनेट में गर्भपात पर बहस: भारतीय-अमेरिकी डॉक्टर का जोरदार बचाव

सीनेट में गरमागरम बहस


नई दिल्ली: हाल ही में अमेरिकी सीनेट में एक महत्वपूर्ण बहस हुई, जिसमें भारतीय-अमेरिकी प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. निशा वर्मा और रिपब्लिकन सीनेटर जोश हॉली के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। यह चर्चा 'महिलाओं की सुरक्षा: गर्भपात दवाओं के खतरों को उजागर करना' विषय पर सीनेट की स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम और पेंशन समिति की सुनवाई के दौरान हुई। डॉ. वर्मा ने इस सुनवाई में डेमोक्रेटिक गवाह के रूप में अपनी बात रखी।


गर्भपात दवाओं का समर्थन

डॉ. वर्मा ने गर्भपात दवाओं की सुरक्षा और प्रभावशीलता का समर्थन करते हुए कहा कि 100 से अधिक उच्च गुणवत्ता वाले अध्ययन इन दवाओं को सुरक्षित मानते हैं। उन्होंने बताया कि 2000 से अब तक 75 लाख से अधिक लोगों ने इन दवाओं का उपयोग किया है। उनका कहना था कि राजनीतिक प्रतिबंध मरीजों के लिए हानिकारक साबित हो रहे हैं।


सवाल-जवाब में टकराव

जब सीनेटर जोश हॉली ने पूछा, "क्या पुरुष गर्भवती हो सकते हैं?" तो डॉ. वर्मा ने सीधे उत्तर देने से परहेज किया। उन्होंने कहा कि वह विभिन्न लैंगिक पहचान वाले मरीजों का इलाज करती हैं और इस सवाल को केवल जैविक पुरुष या महिला की सीमाओं में नहीं बांध सकतीं। उन्होंने इसे "राजनीतिक हथियार" करार दिया, जो चिकित्सा और मरीजों की जटिलताओं को सरल बना देता है।


सीनेटर हॉली का विरोध

सीनेटर हॉली ने डॉ. वर्मा के तर्कों को खारिज करते हुए कहा, "गर्भवती महिलाएं होती हैं, पुरुष नहीं।" उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि विशेषज्ञ बुनियादी जैविक तथ्यों को स्वीकार नहीं करतीं, तो उनकी गवाही पर भरोसा कैसे किया जा सकता है। हॉली ने यह भी दावा किया कि गर्भपात की दवाओं से 11 प्रतिशत मामलों में प्रतिकूल स्वास्थ्य घटनाएँ हो सकती हैं, जो एफडीए के आंकड़ों से अधिक हैं।


डॉ. वर्मा का स्पष्टीकरण

अपने रुख का बचाव करते हुए, डॉ. वर्मा ने कहा कि उनका उद्देश्य विज्ञान और मरीजों के वास्तविक अनुभवों के बीच संतुलन बनाना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ध्रुवीकृत या सरल प्रश्न जटिल चिकित्सा वास्तविकताओं को सही ढंग से नहीं दर्शा सकते।