ईरान-अमेरिका तनाव: क्या है ईरान की सैन्य रणनीति और तैयारी?
तनाव का नया मोड़
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव अब एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुका है। दोनों देशों के बीच शांति वार्ता का दूसरा दौर शुरू होने वाला है, लेकिन इससे पहले स्थिति काफी तनावपूर्ण बनी हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि बातचीत सफल नहीं होती, तो ईरान के पुलों और बिजली संयंत्रों को निशाना बनाया जा सकता है। लेकिन यह सवाल उठता है कि पिछले 50 दिनों से चल रहे इस संघर्ष में ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्या ईरान को पूरी तरह से नष्ट करना इतना सरल है? इन सवालों के उत्तर ईरान की रणनीति और उसकी तैयारियों में छिपे हैं।
ईरान की जनसंख्या की एकजुटता
जब अमेरिका ने पहले भी ऐसी धमकियां दी थीं, तब ईरान के नागरिकों ने अपने देश के महत्वपूर्ण ढांचों की सुरक्षा के लिए एक अनोखा कदम उठाया। उन्होंने बिजली संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण स्थलों के चारों ओर मानव श्रृंखला बनाई, जिसे 'जां फिदा' नाम दिया गया, जिसका अर्थ है 'जीवन का बलिदान' या 'पूर्ण समर्पण'। यह केवल एक प्रतीकात्मक कदम नहीं था, बल्कि देश की रक्षा के लिए लोगों की एकजुटता को दर्शाने का एक तरीका था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस अभियान में लगभग डेढ़ से दो करोड़ लोग शामिल हुए थे, जो यह दर्शाता है कि आम जनता देश की सुरक्षा को लेकर कितनी गंभीर है।
ईरान की सैन्य संरचना
ईरान की सैन्य शक्ति को समझना थोड़ा जटिल है, क्योंकि वहां कई स्तरों पर विभिन्न सेनाएं कार्यरत हैं। पारंपरिक सेना के साथ-साथ विशेष बल भी मौजूद हैं, जो अलग-अलग जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। ईरान की नियमित सेना, जिसे 'आरतेश' कहा जाता है, देश की सीमाओं की रक्षा और पारंपरिक युद्ध के लिए जिम्मेदार होती है।
इसके अतिरिक्त, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) एक शक्तिशाली सैन्य इकाई है, जो न केवल सुरक्षा में, बल्कि देश की राजनीतिक व्यवस्था की रक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ये सभी संस्थाएं सीधे देश के सर्वोच्च नेता के अधीन काम करती हैं, जिससे कमान एक ही स्थान पर केंद्रित रहती है।
IRGC की ताकत और रणनीति
IRGC को ईरान की सबसे प्रभावशाली सैन्य ताकत माना जाता है। यह न केवल भूमि और समुद्र में सक्रिय है, बल्कि हवाई सुरक्षा और ड्रोन तकनीक पर भी इसका नियंत्रण है। ईरान ने हाल के वर्षों में ड्रोन तकनीक पर विशेष ध्यान दिया है। उसने ताजिकिस्तान में ड्रोन निर्माण की फैक्ट्री स्थापित की और रूस के साथ मिलकर उत्पादन बढ़ाया। कहा जाता है कि रूस अब इन ड्रोन का उत्पादन करने में सक्षम हो चुका है। यह सब केवल सहयोग के लिए नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था, ताकि युद्ध की स्थिति में ईरान को संसाधनों की कमी न हो।
हथियारों की आपूर्ति की रणनीति
ईरान को पहले से पता था कि भविष्य में उसे अमेरिका या इजरायल जैसे देशों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए, उसने अपने हथियारों के उत्पादन और भंडारण को विभिन्न स्थानों पर फैलाया। उसने रूस और ताजिकिस्तान जैसे देशों में भी सैन्य उत्पादन की व्यवस्था की, ताकि आवश्यकता पड़ने पर वहां से सहायता मिल सके। इसके अलावा, मिसाइलों को देश के विभिन्न हिस्सों में सुरक्षित बंकरों में रखा गया है। इससे दुश्मन के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि हमला कहां से होगा या हथियार कहां रखे गए हैं। इससे ईरान की रक्षा क्षमता और मजबूत हो जाती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य की रणनीति
इस संघर्ष में ईरान की सबसे बड़ी रणनीति होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण करना है। यह मार्ग विश्व के तेल और गैस आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि यह मार्ग बंद हो जाता है, तो वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट उत्पन्न हो सकता है। यही कारण है कि ईरान के इस कदम से पूरी दुनिया चिंतित हो जाती है। इस रणनीति के चलते अमेरिका पर भी दबाव बनता है कि वह युद्ध को लंबा न खींचे और बातचीत के माध्यम से समाधान निकाले। यही कारण है कि अमेरिका बार-बार वार्ता के लिए आगे आता दिख रहा है।
खाड़ी देशों के माध्यम से दबाव बनाने की नीति
ईरान ने एक और महत्वपूर्ण रणनीति अपनाई है। भले ही उसके पास अमेरिका तक सीधे पहुंचने वाली मिसाइलें सीमित हों, लेकिन उसने अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बनाने का तरीका चुना है। जब भी अमेरिका या इजरायल ईरान के तेल और गैस ठिकानों को निशाना बनाते हैं, तो ईरान खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों या ऊर्जा संसाधनों पर जवाबी कार्रवाई करता है। इससे सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे देश तुरंत सक्रिय हो जाते हैं और अमेरिका पर दबाव डालते हैं कि वह स्थिति को और न बिगाड़े। इस तरह ईरान ने क्षेत्रीय संतुलन का उपयोग अपने पक्ष में किया है।
