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क्या पाकिस्तान बन सकता है ईरान-अमेरिका संघर्ष का शांति मध्यस्थ?

पाकिस्तान वर्तमान में ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष में एक महत्वपूर्ण शांति मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहा है। इस्लामाबाद की कूटनीतिक सक्रियता ने वैश्विक स्तर पर चर्चा को जन्म दिया है, लेकिन सऊदी अरब के साथ उसके रक्षा समझौतों के कारण यह प्रयास चुनौतीपूर्ण हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान सफल होता है, तो यह उसकी वैश्विक साख को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है। हालांकि, आंतरिक और बाहरी दबाव भी पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
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क्या पाकिस्तान बन सकता है ईरान-अमेरिका संघर्ष का शांति मध्यस्थ?

पाकिस्तान की नई भूमिका


नई दिल्ली: मध्य पूर्व में चल रहे ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच, पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण शांति मध्यस्थ के रूप में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है। बढ़ते युद्ध और ऊर्जा संकट के खतरे के बीच, इस्लामाबाद की कूटनीतिक गतिविधियों ने वैश्विक स्तर पर नई चर्चाओं को जन्म दिया है।


सऊदी अरब के साथ चुनौती

हालांकि, पाकिस्तान की यह भूमिका सभी के लिए सहज नहीं है। विशेष रूप से सऊदी अरब के साथ उसके रक्षा समझौतों और क्षेत्रीय समीकरणों के कारण, यह प्रयास उसके लिए चुनौतीपूर्ण बनता जा रहा है।


कूटनीतिक प्रयासों में तेजी

रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशें तब तेज हुईं जब सेना प्रमुख असीम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सीधे बातचीत की। इसके बाद, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से संपर्क किया और इस्लामाबाद को संभावित युद्धविराम वार्ता के स्थान के रूप में प्रस्तावित किया।


15 सूत्रीय शांति योजना का अस्वीकृति

खबरों के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका की 15 सूत्रीय शांति योजना ईरान तक पहुंचाई, लेकिन तेहरान ने इसे स्वीकार नहीं किया। पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र लंबे समय से इस गुप्त कूटनीति में सक्रिय हैं, लेकिन हालिया तनाव ने इन प्रयासों को और तेज कर दिया है।


पाकिस्तान की चुनौतियाँ

यदि ईरान समझौते के लिए तैयार नहीं होता, तो पाकिस्तान की स्थिति जटिल हो सकती है। खासकर सऊदी अरब के साथ उसके रक्षा समझौते के कारण, कोई भी बड़ा तनाव उसे सीधे इस संघर्ष में खींच सकता है।


वैश्विक कद में वृद्धि की संभावना

अगर पाकिस्तान वाशिंगटन और तेहरान को एक मंच पर लाने में सफल होता है, तो यह उसकी वैश्विक साख को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है। इसे 1972 में अमेरिका-चीन के बीच गुप्त कूटनीति में निभाई गई भूमिका के समान माना जा रहा है।


आंतरिक और बाहरी दबाव

पाकिस्तान, जो एक ओर अमेरिका और दूसरी ओर ईरान से संपर्क बनाए हुए है, इस संघर्ष के खत्म होने से सीधे लाभान्वित हो सकता है। लेकिन देश के भीतर भी चुनौतियां हैं।


ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिससे आंतरिक दबाव भी बढ़ा।


विशेषज्ञों की राय

क्विंसी इंस्टीट्यूट के एडम वेनस्टीन ने कहा, "पाकिस्तान के पास एक मध्यस्थ के रूप में असाधारण विश्वसनीयता है, क्योंकि वह वाशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए रखता है, जबकि दोनों के साथ तनावपूर्ण संबंधों का इतिहास इसे एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में देखे जाने के लिए पर्याप्त दूरी प्रदान करता है।"


अमेरिका और ईरान के साथ जटिल रिश्ते

पिछले एक साल में पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने ट्रंप के साथ संबंध मजबूत किए हैं। दावोस में मुलाकात के बाद कूटनीतिक रिश्तों में नई गति आई है।


रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच कई संदेशों के आदान-प्रदान में भी भूमिका निभाई है।


सऊदी अरब के साथ समझौता बना चुनौती

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा समझौता इस स्थिति को और संवेदनशील बनाता है। यदि ईरान खाड़ी देशों पर हमले जारी रखता है, तो इस्लामाबाद के लिए संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है।


विदेश मंत्री इसहाक डार ने भी कहा कि पाकिस्तान इस समझौते से बंधा हुआ है, लेकिन वह कूटनीतिक प्रयासों के जरिए संघर्ष से दूर रहने की कोशिश कर रहा है।