क्या सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की का गठबंधन बनेगा इस्लामिक NATO?
सऊदी अरब और पाकिस्तान का रक्षा समझौता
सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ, जिसने वैश्विक स्तर पर हलचल मचा दी। इस समझौते के अनुसार, यदि एक देश पर हमला होता है, तो दूसरा उसे अपने खिलाफ हमला मान लेगा। यह स्थिति NATO के सिद्धांतों के समान है, जिससे विशेषज्ञ इसे 'इस्लामिक NATO' की नींव मान रहे हैं। सऊदी अरब, जो पहले अमेरिका पर निर्भर था, अब अपनी सुरक्षा के लिए एक स्वतंत्र ढांचा बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। इससे पाकिस्तान को अरब देशों का समर्थन मिलने की संभावना है, जो भारत के लिए चिंता का विषय बन रहा है.
क्या तुर्की इस्लामिक NATO का हिस्सा बनेगा?
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, तुर्की भी इस गठबंधन में शामिल होने की योजना बना रहा है। तुर्की, जो NATO का सदस्य है, के पास अत्याधुनिक सैन्य तकनीक और ड्रोन हैं। वह पहले से ही पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों और नौसेना को उन्नत कर रहा है। यदि तुर्की इस गठबंधन में शामिल होता है, तो यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक तकनीकी सैन्य शक्ति के रूप में उभर सकता है। सऊदी अरब वित्तीय सहायता प्रदान करेगा, पाकिस्तान परमाणु शक्ति देगा, और तुर्की तकनीकी सहयोग प्रदान करेगा। यह संयोजन किसी भी क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा बन सकता है.
क्या अमेरिका से मुस्लिम देशों का विश्वास उठ रहा है?
हाल के वर्षों में, मुस्लिम देशों का अमेरिका पर विश्वास कमजोर हुआ है। इजरायल और हमास के बीच संघर्ष के बाद अरब देशों को लगा कि अमेरिका संकट के समय उनके साथ नहीं खड़ा हुआ। NATO के भीतर भी मतभेद बढ़ गए हैं। वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियों ने सहयोगियों को असमंजस में डाल दिया है। इस स्थिति में, सऊदी अरब और कतर जैसे देश अपनी सुरक्षा के लिए एक नया ढांचा बनाने की कोशिश कर रहे हैं, और इस्लामिक NATO इसी सोच का परिणाम है.
क्या पाकिस्तान अरब देशों का न्यूक्लियर कवच बन रहा है?
पाकिस्तान एकमात्र मुस्लिम देश है जिसके पास परमाणु हथियार हैं। सऊदी अरब और अन्य अरब देशों के पास धन और संसाधन हैं, लेकिन परमाणु शक्ति नहीं है। इजरायल के पास गुप्त परमाणु हथियार होने की चर्चा है। अरब देशों को चिंता है कि किसी संकट के समय वे कमजोर पड़ सकते हैं, इसलिए वे पाकिस्तान को न्यूक्लियर सुरक्षा के रूप में देख रहे हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान की भूमिका अचानक महत्वपूर्ण हो गई है.
क्या तीनों देशों के लाभ एक समान हैं?
पाकिस्तान चाहता है कि उसे भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिले। सऊदी अरब को परमाणु सुरक्षा की आवश्यकता है, जबकि तुर्की मुस्लिम दुनिया का सैन्य नेता बनना चाहता है। तीनों की आवश्यकताएँ अलग हैं, लेकिन उनका मार्ग एक ही है। यही कारण है कि यह गठबंधन धीरे-धीरे मजबूत हो सकता है, जिसमें धन, शक्ति और तकनीक शामिल हैं, जो इसे खतरनाक बनाता है.
क्या अन्य मुस्लिम देश भी इस गठबंधन में शामिल हो सकते हैं?
मिस्र ने इस तरह के सैन्य ढांचे में सैनिकों की पेशकश की है। कतर और यूएई भी वित्तीय सहायता देने के लिए तैयार हैं। दोहा में हुई बैठकों में इस विचार पर गंभीर चर्चा हुई है। हालांकि अभी कोई निश्चित तारीख तय नहीं हुई है, लेकिन आधार तैयार हो चुका है। यदि यह गठबंधन बनता है, तो यह केवल तीन देशों का नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की आवाज बन सकता है.
क्या भारत के लिए यह नई रणनीतिक चुनौती है?
भारत के लिए यह गठबंधन एक सीधा खतरा बन सकता है। यदि पाकिस्तान को सऊदी और तुर्की का समर्थन मिलता है, तो वह भारत के खिलाफ अधिक आक्रामक हो सकता है। सऊदी अरब भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है, और तुर्की पहले से ही पाकिस्तान के साथ खड़ा है। ऐसे में तीनों का एक सैन्य ब्लॉक बनना भारत की कूटनीति के लिए एक नई चुनौती होगी। हालांकि भारत मजबूत है, लेकिन यह गठबंधन पूरे क्षेत्र की राजनीति को बदल सकता है.
