चीन के प्रति ट्रंप प्रशासन की नई नीति: नरमी और कूटनीतिक बदलाव
ट्रंप प्रशासन ने चीन के प्रति अपनी नीति में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं, जिसमें सख्त रुख को छोड़कर नरम दृष्टिकोण अपनाया गया है। यह बदलाव राष्ट्रपति ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में देखने को मिला है, जहां उन्होंने बीजिंग के साथ संबंधों में सुधार की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। जानें कि यह नई कूटनीति क्या संकेत देती है और इसके पीछे के कारण क्या हैं।
| Apr 10, 2026, 16:32 IST
चीन के प्रति अमेरिका की नई रणनीति
पेंटागन और व्हाइट हाउस के बीच चीन के मुद्दे पर मतभेद अब स्पष्ट हो गए हैं। पिछले वर्ष, जब सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति ट्रंप को रक्षा रणनीति का एक मसौदा प्रस्तुत किया, जिसमें चीन को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया, तो ट्रंप ने न केवल असहमति जताई, बल्कि इसे पूरी तरह से बदलने का निर्देश भी दिया। जनवरी में जारी संशोधित 'नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी' में इस बदलाव का प्रभाव स्पष्ट है, जहां दशकों पुरानी सख्त नीति को छोड़कर बीजिंग के प्रति एक नरम दृष्टिकोण अपनाया गया है। यह बदलाव दर्शाता है कि ट्रंप प्रशासन अब चीन के साथ पुरानी दुश्मनी के बजाय एक नई कूटनीतिक दिशा की ओर बढ़ रहा है। अमेरिका की राजनीति में हर सरकार अपनी नई रक्षा रणनीति बनाती है, लेकिन ट्रंप 2.0 अपने पिछले कार्यकाल के निर्णयों को पलटकर सबको चौंका रहे हैं। जिस चीन को 'ट्रंप 1.0' के दौरान अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन माना गया था, अब उसके प्रति व्हाइट हाउस का रुख पूरी तरह बदल चुका है। ट्रंप 2.0 का नया मंत्र अब 'टकराव' नहीं, बल्कि 'शांति' प्रतीत हो रहा है।
चीन के प्रति नरमी के कारण
अक्टूबर में दक्षिण कोरिया के बुसान में शी जिनपिंग के साथ हुई मुलाकात के बाद, ट्रंप प्रशासन ने बीजिंग के प्रति कई महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव किए हैं। अमेरिका ने न केवल चीनी उद्योगों पर भारी टैरिफ को रोक दिया है, बल्कि सुरक्षा के लिए खतरा मानी जाने वाली चीनी कंपनियों पर कार्रवाई से भी पीछे हट गया है। इसके अलावा, चीनी हैकर्स की जांच धीमी कर दी गई है और अमेरिका में चीनी निवेश को बिना किसी विशेष सख्ती के अनुमति दी जा रही है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे चीन के खिलाफ अपने बयानों में नरमी लाएं, जो वाशिंगटन की दशकों पुरानी विदेश नीति में एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव का संकेत है।
ट्रंप की नई कूटनीतिक दिशा
राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत वैश्विक व्यापार और सुरक्षा व्यवस्था को एकतरफा रूप से बदलने के प्रयास से हुई है। लक्ष्य अभी भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अमेरिका-केंद्रित द्विपक्षीय संबंधों के मॉडल में पुनर्गठित करना है, जिससे केवल अमेरिका को लाभ हो। ट्रंप के कई प्रयासों के अप्रत्याशित परिणाम निकले हैं। विशेष रूप से, उन्हें उम्मीद थी कि चीनी वस्तुओं का प्रभावी बहिष्कार आर्थिक रूप से कमजोर बीजिंग को अमेरिका के लिए अधिक अनुकूल व्यापार शर्तों को स्वीकार करने के लिए मजबूर करेगा। इसके विपरीत, चीन ने दुर्लभ खनिजों पर प्रतिबंध लगा दिए, जो डिजिटल युग की उपभोक्ता और सैन्य प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक हैं। इस कदम ने राष्ट्रपति ट्रंप को पीछे हटने और अमेरिकी निर्मित सेमीकंडक्टर और अन्य प्रौद्योगिकियों तक चीनी पहुंच के रूप में रियायतें देने के लिए मजबूर कर दिया।
ट्रंप की चीन नीति पर हैरानी
अमेरिकी प्रशासन के भीतर चीन को घेरने की हर कोशिश अब पूरी तरह ठप होती नजर आ रही है। वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने कड़ा फरमान जारी किया है कि चीन से जुड़े किसी भी एक्शन के लिए उनकी लिखित मंजूरी अनिवार्य होगी। स्थिति इतनी अजीब हो गई है कि बड़े अधिकारी फाइलों पर दस्तखत के लिए घंटों उनके दफ्तर के बाहर खड़े रहते हैं। ट्रंप प्रशासन के इस यू-टर्न से सुरक्षा सलाहकार और चीन के प्रति सख्त रुख रखने वाले अधिकारी गहरे सदमे में हैं। वे इसे 'बुसान फ्रीज' का नाम दे रहे हैं, यानी वह समझौता जिसने चीन के खिलाफ चल रही हर कार्रवाई को ठंडा कर दिया है। इस नरम रुख के पीछे ट्रंप की बड़ी रणनीति आगामी मई में शी जिनपिंग के साथ होने वाली मुलाकात की तैयारी करना है, ताकि एक नाजुक व्यापारिक समझौते को बचाया जा सके।
