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तालिबान के नए कानून से पाकिस्तान की महिलाओं में बढ़ा डर

पाकिस्तान की महिलाएं तालिबान के नए कानूनों के कारण गहरे डर में जी रही हैं। नए फरमानों ने घरेलू हिंसा को वैध कर दिया है, जिससे पुरुषों को अपनी पत्नियों पर हाथ उठाने की अनुमति मिल गई है। इस स्थिति ने महिलाओं के अधिकारों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, क्योंकि उन्हें न्याय पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। जानिए इस गंभीर मुद्दे पर और क्या हो रहा है।
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तालिबान के नए कानून से पाकिस्तान की महिलाओं में बढ़ा डर

पाकिस्तान में महिलाओं का खौफ

पाकिस्तान की महिलाएं इस समय गहरे डर में जी रही हैं। यह डर केवल तालिबान से नहीं, बल्कि नए तालिबानी कानूनों से भी है। भले ही यह सुनने में पुरानी बात लगे, लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान के शासन के दौरान महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। पहले भी ऐसी खबरें आई हैं, जिसमें महिलाओं को सरेआम कोड़े मारने, पत्थर से मारने और सिर कलम करने जैसी अमानवीय सजाएं दी जाती थीं। ऐसे में कौन नहीं डरेगा? लेकिन अफगानिस्तान की महिलाओं का डर केवल इन सजाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर दिन होने वाली हिंसा का भी है। वहां, पत्नी को पीटना अब गैरकानूनी नहीं रहा। 90 पन्नों का तालिबानी फरमान कहता है कि पत्नियों को पीटना तब तक ठीक है जब तक कि जख्म न दिखें। इसका मतलब यह है कि अफगानिस्तान में एक छोटी सी शर्त पूरी करने पर महिलाओं को पीटना कानूनी अपराध नहीं है।


नए फरमान का प्रभाव

इस नए फरमान ने घरेलू हिंसा को एक अलग तरीके से वैध कर दिया है। अब पुरुषों को अपनी पत्नियों पर हाथ उठाने की अनुमति मिल गई है, लेकिन एक शर्त के साथ। तालिबान के नए कानून के अनुसार, पति अपनी पत्नी और बच्चों को शारीरिक सजा दे सकता है, लेकिन यह तब तक कानूनी है जब तक हड्डी न टूटे या कोई खुला घाव न हो। यदि पति अत्यधिक बल का प्रयोग करता है और पत्नी की हड्डी टूट जाती है, तो उसे अधिकतम 15 दिन की जेल हो सकती है। इसके लिए पत्नी को अदालत में अपनी चोटें साबित करनी होंगी। इसके अलावा, यदि कोई महिला अपने पति की अनुमति के बिना अपने रिश्तेदारों से मिलती है, तो उसे 3 महीने तक की जेल हो सकती है।


महिलाओं के अधिकारों का हनन

तालिबान के शासन से पहले, अफगानिस्तान में घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं के लिए सख्त कानून थे। 2009 में बनाए गए इस कानून को 'एलिमिनेशन ऑफ वायलेंस अगेंस्ट वुमेन' कहा जाता था। लेकिन तालिबान सरकार ने इस 17 साल पुराने कानून को रद्द कर दिया है। विडंबना यह है कि जिस अफगानिस्तान में महिलाओं को अकेले बाहर जाने की अनुमति नहीं है, वे पति की हिंसा के बाद अदालत कैसे जा सकती हैं? उन्हें अपने किसी रिश्तेदार को साथ ले जाना होगा और यदि चोट लगी है, तो उसे अदालत में दिखाना होगा। लेकिन तालिबान के अन्य कानूनों के कारण, कोई भी महिला न तो भीड़ में बुर्का उतार सकती है और न ही कपड़े हटा सकती है। ऐसे में उन्हें हिंसा के खिलाफ न्याय कैसे मिलेगा?