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नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की कूटनीति पर उठ रहे सवाल

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की कूटनीति पर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने विदेश दौरे से परहेज किया है और केवल समकक्ष स्तर पर मुलाकात करने का निर्णय लिया है। उनकी नीति नेपाल के पारंपरिक संबंधों को चुनौती दे रही है, खासकर भारत और चीन के साथ। जानें कि कैसे उनकी चुप्पी और सीमित मुलाकातें नेपाल की विदेश नीति को प्रभावित कर सकती हैं और भविष्य में क्या चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं।
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नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की कूटनीति पर उठ रहे सवाल

नेपाल की वैश्विक कूटनीति में बालेन शाह का नया दृष्टिकोण

बालेंद्र शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद से नेपाल की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर कई सवाल उठ रहे हैं। कभी भारत के साथ उनके संबंधों में तनाव देखा गया है, तो कभी अमेरिका के साथ। उन्होंने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री और दक्षिण एशिया के विशेष राजदूत सर्गियो गोर से मिलने से भी इनकार कर दिया।


बालेन शाह का विदेश दौरा न करने का निर्णय

बालेंद्र शाह ने एक साल तक विदेश यात्रा न करने का निर्णय लिया है। वह विदेशी प्रतिनिधियों से केवल समकक्ष स्तर पर मिलने की इच्छा रखते हैं, अर्थात् यदि वह प्रधानमंत्री हैं, तो उनसे केवल अन्य प्रधानमंत्रियों से ही मुलाकात करेंगे, न कि विदेश मंत्रियों या राजदूतों से।


नेपाल की विदेश नीति में बदलाव की कोशिश

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की विदेश नीति पर सवाल उठ रहे हैं। वे नेपाल की पारंपरिक विदेश नीति को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। जब नेपाल में राजतंत्र था, तब भारत की ओर उनका झुकाव स्वाभाविक था। लेकिन अब नेपाल चीन की ओर अधिक झुका हुआ दिखाई दे रहा है। बालेन शाह इस स्थिति में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।


नेपाल में राजनीतिक बदलाव

2008 में नेपाल में कई वर्षों की हिंसक क्रांति और राज परिवार के नरसंहार के बाद एक नई लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई। नेपाल ने 1996 से 2006 तक माओवादी विद्रोह का सामना किया। लोकतंत्र की स्थापना के बाद राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव आया, लेकिन विदेश नीति में कई चीजें बदल चुकी थीं। माओवादी सरकार का झुकाव स्वाभाविक रूप से चीन की ओर था।


भारत के साथ रिश्तों में तनाव?

नेपाल में जेन जेड युवाओं के आंदोलन के बाद, नई सरकार नेपाल के रिश्तों को बदलने की कोशिश कर रही है। बालेन शाह 'राष्ट्र प्रथम' की नीति पर भरोसा करते हैं, लेकिन यह उनके लिए चुनौतियाँ पैदा कर रहा है। उन्होंने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात नहीं की, जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ भारतीय प्रतिनिधियों की मुलाकातें होती रहीं।


बालेन शाह की नीति पर विशेषज्ञों की राय

दीवान लॉ कॉलेज में इंटरनेशनल स्टडीज के असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता का कहना है कि बालेन शाह विदेशी राजदूतों से सामूहिक रूप से मिलते हैं, जो कूटनीतिक दृष्टिकोण से सही नहीं है। नेपाल में भारत विरोध बढ़ रहा है और भारतीयों के साथ बदसलूकी के मामले भी सामने आ रहे हैं।


बालेन शाह की चुप्पी का कारण

एक स्थानीय अखबार के वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार का कहना है कि बालेन शाह ने अपनी कैंपेनिंग में संयमित रहकर सीमित मुलाकातों को प्राथमिकता दी है। उन्होंने सर्गियो गोर से मिलने से इनकार किया, यह कहते हुए कि उनकी घरेलू प्राथमिकताएँ हैं।


भारत और अमेरिका के प्रति समान रुख

प्रेम कुमार ने बताया कि बालेन शाह ने न तो सर्गियो गोर से मुलाकात की और न ही विदेश सचिव विक्रम मिस्री से। उनकी जगह विदेश मंत्री शिशिर खनाल और वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले मिल रहे हैं।


चीन के साथ भी बालेन शाह का रुख

बालेन शाह ने चीन के राजदूत झांग माओमिंग से भी मुलाकात नहीं की। चीन नेपाल के साथ संपर्क बनाए रखना चाहता है, लेकिन नेपाल चुप है। तिब्बत चीन के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और नेपाल में तिब्बती निर्वासियों की गतिविधियों पर चीन की नजर रहती है।


बालेन शाह की नीति से नेपाल की चुनौतियाँ

निखिल गुप्ता ने कहा कि नेपाल एक बफर देश है जो दो बड़े देशों से घिरा हुआ है। नेपाल की औद्योगिक क्रांति और अस्थिर सरकारों के कारण यह हाशिए पर है। यदि बालेन शाह एक साल तक अपनी नीतियों के बारे में चुप्पी साधे रखते हैं, तो यह अनिश्चितता पैदा कर सकता है और भारत जैसे देशों से दूरी बढ़ा सकता है।