नेपाल में सांप्रदायिक तनाव: क्या है हालात की असली वजह?
सांप्रदायिक हिंसा का नया दौर
नई दिल्ली: नेपाल के भारत से सटे क्षेत्रों में एक बार फिर सांप्रदायिक तनाव ने हिंसक रूप धारण कर लिया है। वीरगंज और धनुषा जैसे संवेदनशील शहरों में स्थिति बिगड़ने के कारण प्रशासन ने कर्फ्यू लगाने का निर्णय लिया। यह घटना शुरू में मामूली विवाद के रूप में शुरू हुई, लेकिन जल्द ही यह हिंदू-मुस्लिम टकराव में बदल गई।
हिंसा की शुरुआत कैसे हुई?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वीरगंज के कमला क्षेत्र में दो मुस्लिम युवकों ने टिकटॉक पर एक हिंदू-विरोधी पोस्ट साझा किया। स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया, और जब पुलिस ने तुरंत कार्रवाई नहीं की, तो गुस्साई भीड़ ने एक मस्जिद में तोड़फोड़ कर दी। इसके बाद पूरे क्षेत्र में तनाव फैल गया।
मस्जिद में तोड़फोड़ के खिलाफ मुस्लिम समुदाय ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया और टायर जलाए। इसके जवाब में हिंदू समुदाय भी विरोध में आ गया। स्थिति को बिगड़ते देख प्रशासन ने तुरंत कर्फ्यू लागू किया।
पुलिस की कार्रवाई और जांच
धनुषा जिला पुलिस के प्रवक्ता गणेश बाम ने बताया कि टिकटॉक वीडियो और मस्जिद में तोड़फोड़ से जुड़े आरोपों में तीन लोगों को हिरासत में लिया गया है। पुलिस ने कहा है कि मामले की गहन जांच जारी है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
सांप्रदायिक हिंसा की बार-बार घटनाएं
नेपाल में हिंदू-मुस्लिम तनाव की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं:
- 2017: कपिलवस्तु में दुर्गा विसर्जन के दौरान पत्थरबाजी, 100 से अधिक मुस्लिम परिवार विस्थापित हुए।
- 2019 (सितंबर-नवंबर): रोतहट और कपिलवस्तु में त्योहारों के जुलूसों को लेकर हिंसा, कर्फ्यू लागू।
- 2020: सरलाही में विश्वकर्मा प्रतिमा विसर्जन पर विवाद।
- 2021: कलैया और देवपुरा में त्योहारों के दौरान झड़पें।
- 2022: महोतरी में जुलूस के दौरान टकराव।
- 2023: सरलाही और बांके में धार्मिक जुलूसों पर तनाव।
- 2024: रौतहट और बीरगंज में सरस्वती पूजा के दौरान हिंसा।
- 2025: बीरगंज, जनकपुरधाम और नेपालगंज में हनुमान जयंती, गणेश विसर्जन और दुर्गा पूजा के दौरान झड़पें, कई लोग घायल और मौत की खबरें।
हिंदू-मुस्लिम तनाव के कारण
यूएन मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट में कहा गया है कि नेपाल में मुस्लिम-विरोधी हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इसका एक बड़ा कारण हिंदू समुदाय में बढ़ता जनजागरण है। नेपाल की जनसंख्या में लगभग 82% हिंदू हैं, जबकि मुसलमानों की संख्या लगभग 9% है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल के मीडिया, सामाजिक, राजनीतिक और न्यायिक तंत्र में मुसलमानों की भागीदारी बहुत सीमित है, जिससे असंतुलन की स्थिति बनती है और तनाव बढ़ता है।
धर्मनिरपेक्षता के बाद के हालात
रिपोर्टों के अनुसार, 2008 से पहले नेपाल एक हिंदू राष्ट्र था। संविधान लागू होने के बाद इसे धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया गया। इसके बाद मुसलमानों ने धार्मिक स्वतंत्रता की मांग की, जिसका असर आसपास के हिंदू समुदायों पर पड़ा और कई इलाकों में सांप्रदायिक टकराव देखने को मिला।
