पाकिस्तान की दुविधा: क्या अब्राहम समझौते में शामिल होगा इस्लामाबाद?
पाकिस्तान की नई चुनौतियाँ
नई दिल्ली: 28 फरवरी को मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद से पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता कराने की कोशिशों में जुटा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों के बीच शांति डील के करीब पहुँचने की संभावना है। सीजफायर को 60 दिनों के लिए बढ़ाने पर भी सहमति बन गई है, लेकिन इस डील से पाकिस्तान को सीधे तौर पर कोई लाभ नहीं मिलने की संभावना है। इसका मुख्य कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई रणनीति है।
ट्रंप की नई पहल: अब्राहम समझौता
Axios की एक रिपोर्ट के अनुसार, जैसे ही अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर हस्ताक्षर होंगे, ट्रंप कई अरब और मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने का आग्रह करेंगे। यह समझौता 2020 में इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए लाया गया था।
दो अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि ट्रंप इस विषय पर सऊदी अरब, UAE, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेताओं से फोन पर बातचीत कर चुके हैं।
फोन पर चुप्पी का माहौल
ट्रंप के प्रस्ताव से सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान के नेताओं में आश्चर्य की स्थिति उत्पन्न हो गई। इन देशों के इजरायल के साथ अभी तक औपचारिक संबंध नहीं हैं। एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, फोन पर कुछ समय के लिए खामोशी रही। तब ट्रंप ने मजाक में पूछा, "क्या आप लोग अभी भी लाइन पर हैं?" इसके बाद उन्होंने कहा कि उनके दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ आगे की बातचीत करेंगे।
अब्राहम समझौता क्या है?
2020 में ट्रंप ने अब्राहम समझौता पेश किया था, जिसके तहत इजरायल और अरब देशों के बीच कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध स्थापित हुए। सबसे पहले UAE और बहरीन ने इस पर हस्ताक्षर किए, इसके बाद मोरक्को और सूडान भी शामिल हुए। इस डील को क्षेत्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना गया। इजरायल के पीएम नेतन्याहू ने इसे "इतिहास का निर्णायक मोड़" कहा था, जबकि आलोचकों का मानना है कि इससे फिलिस्तीनी मुद्दा पीछे छूट गया।
पाकिस्तान की पुरानी स्थिति
पाकिस्तान इस समझौते से पहले ही दूर रहा था। पूर्व पीएम इमरान खान ने कहा था कि यह टू-स्टेट समाधान के खिलाफ है। उन्होंने मिडिल ईस्ट आई को बताया, "मेरा जमीर इजरायल को स्वीकार करने की अनुमति नहीं देता।" खान ने आरोप लगाया था कि अमेरिका ने उन पर दबाव डाला था। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान अब्राहम समझौते को स्वीकार करता है, तो जम्मू-कश्मीर पर उसका रुख कमजोर हो सकता है।
शहबाज सरकार का स्पष्ट इनकार
इमरान खान ने दावा किया था कि पीएम शहबाज शरीफ की सरकार को भी इस डील को स्वीकार करने का निर्देश दिया गया था। लेकिन जनवरी में शरीफ सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि वह अब्राहम समझौते में शामिल नहीं होगी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा, "पाकिस्तान का रुख वही है। हम अब्राहम समझौते का हिस्सा नहीं बनेंगे।"
पाकिस्तान का अगला कदम क्या होगा?
ट्रंप अधिक से अधिक मुस्लिम देशों पर इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने का दबाव बना रहे हैं। ऐसे में सभी की नजर पाकिस्तान के अगले कदम पर है। क्या वह अपने पुराने रुख पर कायम रहेगा या दबाव में झुकेगा, यह देखना बाकी है।
