पाकिस्तान की शांति की भूमिका पर सवाल: अफगानिस्तान में ताजा हमले ने बढ़ाई चिंताएं
पाकिस्तान की असलियत का पर्दाफाश
ईरान और अमेरिका के बीच शांति स्थापित करने का दिखावा करने वाला पाकिस्तान अब अपनी असलियत को उजागर कर रहा है। हाल ही में अफगानिस्तान पर किए गए हमलों ने यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तान वास्तव में शांति का समर्थक नहीं है। दोनों देशों के बीच जो नाजुक युद्धविराम था, वह अब टूटने की कगार पर है। सोमवार को कुनर प्रांत में हुए हमलों ने पूरे क्षेत्र को हिला कर रख दिया है। तालिबान अधिकारियों का आरोप है कि इस्लामाबाद ने नागरिक इलाकों और सैयद जमालुद्दीन अफगानी विश्वविद्यालय को निशाना बनाते हुए मोर्टार और राकेट दागे, जिससे कई लोग मारे गए और कई अन्य घायल हुए। पाकिस्तान ने इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
तालिबान का आरोप और हमले की गंभीरता
तालिबान के उप प्रवक्ता हमदुल्ला फितरत ने बताया कि दोपहर करीब दो बजे शुरू हुए हमलों में असदाबाद और मनोगई जिले के कई हिस्सों को निशाना बनाया गया। उनके अनुसार, लगभग सत्तर लोग घायल हुए, जिनमें तीस छात्र और कई बच्चे शामिल हैं। यह केवल सीमा पार गोलाबारी नहीं है, बल्कि सीधे नागरिक ढांचे और शिक्षा संस्थानों पर हमला है, जिसे तालिबान ने युद्ध अपराध करार दिया है।
शांति वार्ता की विफलता
यह घटनाक्रम और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि यह हमला उस समय हुआ है जब हाल ही में चीन की मध्यस्थता में दोनों देशों के बीच शांति वार्ता हुई थी। मार्च में ईद के मौके पर सऊदी अरब, तुर्की और कतर की पहल पर एक अस्थायी युद्धविराम लागू किया गया था, जिसने कुछ समय के लिए हिंसा पर नियंत्रण रखा था। लेकिन अब यह स्पष्ट है कि वह युद्धविराम केवल कागजी साबित हो रहा है।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ता तनाव
पिछले साल अक्टूबर से ही दोनों देशों के रिश्ते लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। फरवरी में पाकिस्तान वायु सेना ने नंगरहार, पक्तिका और खोस्त में हवाई हमले किए थे। पाकिस्तान का दावा था कि उसने तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान और इस्लामिक स्टेट खुरासान के ठिकानों को निशाना बनाया। इसके जवाब में अफगान बलों ने सीमा चौकियों पर बड़े हमले किए, जिसके बाद पाकिस्तान ने गजब लिल हक नामक अभियान छेड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि डूरंड रेखा पर लगातार झड़पें और गोलीबारी आम हो गईं।
रणनीतिक दृष्टिकोण से खतरा
इस ताजा घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास चरम पर है। पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा मुद्दा तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान है, जो अफगान जमीन से हमले करता है। इस्लामाबाद लगातार काबुल पर आरोप लगाता है कि वह इन उग्रवादियों को पनाह देता है। वहीं, अफगानिस्तान पलटवार करते हुए कहता है कि पाकिस्तान उसकी संप्रभुता का उल्लंघन करता है और शत्रुतापूर्ण तत्वों को बढ़ावा देता है।
बाहरी शक्तियों की भूमिका
रणनीतिक दृष्टिकोण से यह टकराव केवल सीमा विवाद नहीं है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया और मध्य एशिया की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा है। डूरंड रेखा पर बढ़ती हिंसा व्यापार मार्गों को प्रभावित कर रही है, जिससे आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ रही हैं। सीमा लंबे समय से बंद जैसी स्थिति में है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग खत्म हो चुका है। सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह संघर्ष धीरे-धीरे पूर्ण युद्ध का रूप ले सकता है।
विश्व समुदाय की जिम्मेदारी
इस पूरे घटनाक्रम में बाहरी शक्तियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। चीन, तुर्की, कतर और सऊदी अरब जैसे देश लगातार मध्यस्थता कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोशिशें जमीन पर असर डालने में नाकाम दिख रही हैं। अगर यह तनाव और बढ़ता है तो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है और यह संघर्ष अंतरराष्ट्रीय दखल को भी आमंत्रित कर सकता है।
पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश
अब वक्त आ गया है कि विश्व समुदाय इस पूरे घटनाक्रम को केवल बयानबाजी तक सीमित न रखे बल्कि ठोस दबाव बनाए। पाकिस्तान को यह स्पष्ट संदेश दिया जाना चाहिए कि वह अमेरिका और ईरान के बीच शांति कराने का नाटक बंद करे और अपने दोहरे आचरण पर लगाम लगाए। अगर वह सच में क्षेत्रीय स्थिरता चाहता है तो उसे पहले अपने पड़ोसी अफगानिस्तान समेत अन्य देशों के साथ रिश्तों को सुधारना होगा, वरना उसकी यह दोहरी नीति पूरे क्षेत्र को अस्थिरता और संघर्ष की आग में झोंकती रहेगी।
