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बरमूडा आइलैंड के नीचे मिली अनोखी चट्टान की परत ने वैज्ञानिकों को चौंकाया

अटलांटिक महासागर में स्थित बरमूडा आइलैंड के नीचे वैज्ञानिकों ने एक अनोखी चट्टान की परत खोजी है, जो 12 मील मोटी है। यह परत ज्वालामुखी गतिविधियों के ठंडा होने के बावजूद आइलैंड को स्थिर बनाए रखती है। शोधकर्ताओं ने भूकंप की लहरों का उपयोग करके इस रहस्य का समाधान निकाला है। जानें इस खोज का महत्व और इसके पीछे की विज्ञान की कहानी।
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बरमूडा आइलैंड के नीचे मिली अनोखी चट्टान की परत ने वैज्ञानिकों को चौंकाया

बरमूडा आइलैंड की रहस्यमयी चट्टान

अटलांटिक महासागर में स्थित बरमूडा आइलैंड के नीचे वैज्ञानिकों ने 12 मील से अधिक मोटी और हल्की चट्टान की एक अद्वितीय परत खोजी है, जो पानी में तैरने वाले एक विशाल तख्ते की तरह कार्य कर रही है। भूविज्ञान के अध्ययन में लगे शोधकर्ताओं को यह समझने में कठिनाई हो रही थी कि बरमूडा आइलैंड समुद्र की सतह से लगभग 1,600 फीट ऊँचा कैसे है, जबकि वहां के ज्वालामुखी पिछले 30 मिलियन वर्षों से निष्क्रिय हैं। सामान्यतः, ज्वालामुखी के ठंडा होने पर आइलैंड का वजन कम होकर नीचे धंस जाना चाहिए था, लेकिन इस विशेष परत की खोज ने इस पहेली को सुलझा दिया है। अमेरिकी वैज्ञानिकों की एक टीम ने भूकंप की लहरों का उपयोग करके इस रहस्य का समाधान निकाला है।


ज्वालामुखी आइलैंड्स की संरचना

आमतौर पर, समुद्र के भीतर ज्वालामुखी आइलैंड्स जैसे हवाई आइलैंड्स का निर्माण एक अलग प्रक्रिया से होता है। हवाई आइलैंड्स 'मेंटल प्लम' के ऊपर बनते हैं, जो धरती के अंदर से उठने वाली गर्म और हल्की पिघली चट्टान की एक धार होती है। जब यह गर्म सामग्री ऊपर की ओर धक्का देती है, तो ज्वालामुखी बनते हैं और समुद्र की सतह को उभारते हैं। लेकिन जब धरती की प्लेटें खिसकती हैं और ज्वालामुखी का फूटना रुक जाता है, तो यह उभार धीरे-धीरे समुद्र में डूब जाता है। बरमूडा के मामले में, यह प्रक्रिया भिन्न रही है, जिसने विज्ञान के पारंपरिक सिद्धांतों को चुनौती दी है।


भूकंप की लहरों से मिली जानकारी

बरमूडा की इस विशेष संरचना को समझने के लिए कॉर्नेगी साइंस के विलियम फ्रेजर और येल यूनिवर्सिटी के जेफरी पार्क ने एक नया दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने विश्वभर में होने वाले बड़े भूकंपों से उत्पन्न लहरों और वाइब्रेशनों का उपयोग किया। ये लहरें जब विभिन्न प्रकार की चट्टानों से गुजरती हैं, तो उनकी गति चट्टान के वजन के अनुसार बदलती है। जैसे पानी में ध्वनि की गति अलग होती है, वैसे ही ठोस लकड़ी में भी। बरमूडा में स्थापित एक मशीन के डेटा का विश्लेषण करके शोधकर्ताओं ने इन लहरों की गति को मापा और आइलैंड के नीचे लगभग 20 मील (32 किलोमीटर) गहराई का एक एक्स-रे जैसा चित्र तैयार किया।


प्राचीन काल से जुड़ी परत

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अनोखी चट्टान की परत को 'अंडरप्लेटिंग' कहा जाता है। यह परत तब बनी थी जब बरमूडा में ज्वालामुखी सक्रिय थे। उस समय, कार्बन से भरपूर पिघली चट्टानें धरती के ऊपरी हिस्से के नीचे जमा हो गईं और ठंडी हो गईं। यह सामग्री संभवतः धरती के गहरे हिस्से से आई थी, जब सभी महाद्वीप एक साथ जुड़े हुए थे, जिसे 'पैंजिया' कहा जाता है।


वैज्ञानिकों की नई खोज

विज्ञान के क्षेत्र में इस खोज की महत्वपूर्णता को विलियम फ्रेजर ने सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि बरमूडा एक रोमांचक और अनोखी जगह है, क्योंकि इसकी संरचना विज्ञान के पारंपरिक मॉडल में नहीं आती। यहां मिली चट्टान की मोटी परत अन्य स्थानों पर नहीं देखी जाती। इस नए डेटा से यह स्पष्ट होता है कि धरती के अंदर अभी भी ऐसी प्रक्रियाएं चल रही हैं, जिन्हें विज्ञान पूरी तरह से समझ नहीं पाया है। अब, विलियम फ्रेजर और उनकी टीम अन्य आइलैंड्स के नीचे भी इसी तरह की संरचना की खोज करने की कोशिश कर रही है।