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बांग्लादेश की राजनीति में उथल-पुथल: राष्ट्रपति और जमात-ए-इस्लामी के बीच टकराव

बांग्लादेश की राजनीति में हाल के घटनाक्रमों ने एक सस्पेंस थ्रिलर का रूप ले लिया है। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने मोहम्मद यूनुस की सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिसमें गुप्त समझौतों और इस्तीफे की गुत्थी शामिल है। जमात-ए-इस्लामी के नेता ने राष्ट्रपति के बयानों पर प्रतिक्रिया दी है, जिससे राजनीतिक तनाव और बढ़ गया है। जानें इस विवाद के पीछे की कहानी और इसके संभावित परिणाम।
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बांग्लादेश की राजनीति में उथल-पुथल: राष्ट्रपति और जमात-ए-इस्लामी के बीच टकराव

बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति

बांग्लादेश की राजनीति इन दिनों एक सस्पेंस थ्रिलर फिल्म की तरह हो गई है। शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद भी 'इस्तीफे के पत्र' और 'असंवैधानिक सरकार' जैसे मुद्दों पर विवाद जारी है। हाल ही में राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन और कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के बीच तनाव बढ़ गया है।


राष्ट्रपति का तीखा हमला

राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने हाल ही में एक साक्षात्कार में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार पर कड़े आरोप लगाए। उन्होंने कई ऐसे खुलासे किए जो ढाका से दिल्ली तक सबको चौंका गए। राष्ट्रपति ने यूनुस सरकार के कई निर्णयों को संविधान के खिलाफ बताया और यह भी कहा कि उन्हें 'हाउस अरेस्ट' में रखा गया था।


गुप्त समझौते का आरोप

उन्होंने यह भी दावा किया कि अमेरिका और यूनुस सरकार के बीच एक गुप्त व्यापार समझौता हुआ था, जिसके बारे में उन्हें जानकारी नहीं दी गई। राष्ट्रपति के इन बयानों पर जमात-ए-इस्लामी के नेता शफीकुर रहमान ने प्रतिक्रिया दी है और राष्ट्रपति को कटघरे में खड़ा किया है।


इस्तीफे की गुत्थी

रहमान ने कहा कि 5 अगस्त को राष्ट्रपति ने कहा था कि उन्हें इस्तीफा मिल गया है, लेकिन अब वह कह रहे हैं कि उनके पास इसका कोई प्रमाण नहीं है। यह स्थिति राष्ट्रपति की वैधता पर सवाल उठाती है।


यूनुस और कट्टरपंथियों का संबंध

बांग्लादेश में यह चर्चा है कि शेख हसीना को हटाने में जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन का बड़ा हाथ था। कई छात्र नेता अब यूनुस की कैबिनेट में मंत्री बन गए हैं, जिससे राष्ट्रपति का यह कहना कि वह केवल सेना और विपक्षी पार्टी BNP के समर्थन पर निर्भर हैं, सत्ता संघर्ष की एक गंभीर तस्वीर पेश करता है।


संविधान और वास्तविकता के बीच संघर्ष

बांग्लादेश में वर्तमान में 'संविधान' और 'वास्तविकता' के बीच संघर्ष चल रहा है। एक ओर वह सरकार है जो आंदोलन से आई है, और दूसरी ओर राष्ट्रपति हैं जिन्हें शेख हसीना ने नियुक्त किया था। यह देखना दिलचस्प होगा कि 2026 के चुनावों तक यह स्थिति कैसे बदलती है।