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भारत और रूस के बीच नई साझेदारी की शुरुआत

भारत और रूस के विदेश मंत्रियों की हालिया मुलाकात ने दोनों देशों के बीच सहयोग को नई दिशा दी है। जयशंकर और लावरोव ने व्यापार, ऊर्जा, और प्रौद्योगिकी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। इस बैठक में भारत ने अपनी रणनीति में विविधता लाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत अब किसी एक शक्ति पर निर्भर नहीं रहना चाहता। जानिए इस मुलाकात के पीछे की रणनीतियों और भविष्य की संभावनाओं के बारे में।
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भारत और रूस के बीच नई साझेदारी की शुरुआत

भारत और रूस की मजबूत दोस्ती

अमेरिका और चीन के बीच चल रही उच्च स्तरीय वार्ता के बीच, दिल्ली में भारत और रूस के बीच संबंधों का एक नया अध्याय खुल रहा है। ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की बैठक से पहले, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूस के विदेश मंत्री सरगई लावरोव की मुलाकात ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में दिल्ली और मॉस्को एक-दूसरे के लिए विश्वसनीय साझेदार बने हुए हैं। इस मुलाकात के बाद, जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर साझा किया कि उनकी बातचीत बेहद सकारात्मक और उपयोगी रही। दोनों नेताओं ने औपचारिक चर्चा के अलावा व्यापार, निवेश, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कनेक्टिविटी और कौशल गतिशीलता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहराई से विचार किया। भारत और रूस अब अपने संबंधों को केवल रक्षा सौदों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं। 


राजनीतिक सहयोग की आवश्यकता

जयशंकर ने बातचीत के दौरान यह स्पष्ट किया कि आज की अनिश्चित और अस्थिर वैश्विक स्थिति में भारत और रूस का राजनीतिक सहयोग पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। उनका इशारा उस वैश्विक माहौल की ओर था, जहां एक ओर पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है और दूसरी ओर अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा दुनिया को नए खेमों में बांट रही है। ऐसे में, भारत और रूस खुद को एक साझेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जो बहु-ध्रुवीय विश्व की बात करते हैं। इस बैठक में दोनों नेताओं ने पिछले वर्ष हुए भारत-रूस शिखर सम्मेलन में लिए गए निर्णयों की समीक्षा की, जिसमें 2030 तक 100 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य का निर्धारण किया गया था। रूस के विदेश मंत्री लावरोव ने कहा कि वर्तमान में दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग 60 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है और उन्हें विश्वास है कि आने वाले वर्षों में यह लक्ष्य हासिल किया जाएगा।


नई रणनीतियों की ओर बढ़ते हुए

दिलचस्प बात यह है कि भारत के विदेश मंत्री ने 'डी रिस्किंग' और 'डायवर्सिफिकेशन' जैसे शब्दों पर जोर दिया। सरल शब्दों में, भारत अब किसी एक शक्ति या आपूर्ति श्रृंखला पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहता। भारत चाहता है कि ऊर्जा, व्यापार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उसके पास कई विकल्प हों, और रूस इस रणनीति में एक महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है। रूस ने भी भारत का समर्थन किया है। लावरोव ने कहा कि ब्रिक्स, संयुक्त राष्ट्र, G20 और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर भारत और रूस का सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया की कई समस्याएं उन देशों ने पैदा की हैं, जो खुद को सबसे शक्तिशाली मानते हैं, लेकिन उनके समाधान के लिए अन्य देशों को मिलकर काम करना होगा। इस प्रकार, दिल्ली में हुई यह मुलाकात केवल दो विदेश मंत्रियों की औपचारिक बैठक नहीं थी।