भारत की सैन्य शक्ति पर अमेरिका का जोर: रक्षा मंत्री ने की सराहना
भारत और अमेरिका के रिश्तों में मजबूती
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच संबंध वैश्विक स्तर पर मजबूत होते जा रहे हैं, और इसका मुख्य कारण भारत की बढ़ती सैन्य ताकत है। यह बात अमेरिका के रक्षा मंत्री द्वारा कही गई है। सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला संवाद में, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भारत को एक उभरती हुई सैन्य शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि भारत अपनी सेना को लगातार आधुनिक बना रहा है और हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव का उल्लेख
अपने भाषण में, हेगसेथ ने भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले साल के सैन्य तनाव का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तनाव कम करने और शांति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि, भारत ने पहले ही स्पष्ट किया है कि युद्धविराम का निर्णय भारत और पाकिस्तान के बीच सीधे बातचीत से हुआ था, जिसमें किसी तीसरे देश की मध्यस्थता नहीं थी।
उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देश अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क हैं और भविष्य में अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करते रहेंगे। अमेरिका दोनों देशों को साझेदार मानता है और किसी को भी दुश्मन की नजर से नहीं देखता।
पाकिस्तान की भूमिका की सराहना
हेगसेथ ने पाकिस्तान की भी प्रशंसा की, यह कहते हुए कि पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उनके अनुसार, पाकिस्तान के नेतृत्व ने क्षेत्रीय शांति प्रयासों में सकारात्मक योगदान दिया है और भविष्य में बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।
भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों पर जोर
भारत और अमेरिका के रक्षा संबंधों पर बात करते हुए, हेगसेथ ने कहा कि दोनों देश मिलकर रक्षा उपकरणों और हथियारों के निर्माण की दिशा में काम कर रहे हैं, जिससे उनकी रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी।
सुरक्षा पर खर्च बढ़ाने की आवश्यकता
अपने भाषण में, उन्होंने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता है कि इस क्षेत्र में शांति और संतुलन बना रहे और कोई भी देश अपना वर्चस्व न थोप सके। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक रूप से मजबूत देशों को अपनी सुरक्षा पर अधिक खर्च करना चाहिए। अमेरिका सहयोग के लिए तैयार है, लेकिन वह नहीं चाहता कि उसके सहयोगी पूरी तरह उसी पर निर्भर रहें।
