मालदीव में अमेरिकी दूत की यात्रा पर विवाद: राष्ट्रपति मुइज्जू का कड़ा रुख
मालदीव में अमेरिकी दूत की यात्रा का विवाद
नई दिल्ली: मार्च 2026 में मालदीव की राजधानी माले में एक सामान्य कूटनीतिक दौरा अचानक विवाद का कारण बन गया। अमेरिका के विशेष दूत सर्जियो गोर ने मालदीव का दौरा किया, जहां उन्होंने विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री से मुलाकात की। हालांकि, राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के साथ निर्धारित बैठक अंतिम समय पर रद्द हो गई, जिसके चलते अमेरिकी दूत बिना राष्ट्रपति से मिले ही लौट गए।
बैठक रद्द होने के कारण
यह केवल एक बैठक के रद्द होने की घटना नहीं थी। राष्ट्रपति मुइज्जू ने ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव पर सख्त रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि मालदीव इस संघर्ष पर अमेरिका से कोई चर्चा नहीं करना चाहता। मुइज्जू ने कहा कि उनके देश की भूमि या हवाई क्षेत्र का उपयोग इस युद्ध के लिए नहीं किया जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि ईरान को जवाब देना है, तो उसे सीधे इजरायल और अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर करना चाहिए, न कि मुस्लिम देशों पर। मुइज्जू के इस बयान को कूटनीतिक हलकों में गंभीरता से लिया गया।
आधिकारिक बयान बनाम वास्तविकता
मालदीव सरकार का कहना है कि राष्ट्रपति हाल के समय में विदेशी नेताओं से सीमित मुलाकातें कर रहे हैं ताकि घरेलू मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जा सके। लेकिन यह माना जा रहा है कि असली कारण मध्य पूर्व के संघर्ष पर मुइज्जू का विरोधी रुख था।
जब अमेरिकी पक्ष ने बैठक पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया, तो निजी बंद कमरे में मुलाकात का प्रस्ताव आया, जिसे अमेरिकी दूत ने स्वीकार नहीं किया।
मुइज्जू की राजनीतिक स्थिति
राष्ट्रपति मुइज्जू 'इंडिया आउट' अभियान के तहत सत्ता में आए थे। हाल के स्थानीय चुनावों में उनकी पार्टी को बड़ा झटका लगा है, जहां विपक्ष ने कई प्रमुख शहरों में जीत हासिल की। इसके अलावा, एक संवैधानिक जनमत संग्रह में भी उनकी सरकार का प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। इस स्थिति में उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर हुई है।
आर्थिक मोर्चे पर भी मालदीव को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार भारत से 400 मिलियन डॉलर के कर्ज को बढ़ाने की मांग कर रही है। चीन को बंदरगाह परियोजना सौंपने से भी विदेश नीति में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं।
इस घटना ने मालदीव की विदेश नीति पर सवाल उठाए हैं। मुइज्जू सरकार 'मालदीव फर्स्ट' नीति पर जोर दे रही है, लेकिन क्षेत्रीय तनाव और आर्थिक दबाव दोनों को संभालना उनके लिए आसान नहीं होगा।
