क्या डिजिटल पेमेंट से बढ़ रही है हमारी फिजूलखर्ची? एक प्रयोग की कहानी
नई दिल्ली में यूपीआई का प्रभाव
नई दिल्ली: आजकल, यूपीआई का उपयोग हर किसी की दिनचर्या का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। चाहे चाय की दुकान हो या बड़े शोरूम, लोग अब पैसे निकालने के बजाय अपने मोबाइल से क्यूआर कोड स्कैन कर तुरंत भुगतान कर रहे हैं। इस सुविधा ने लेनदेन को बेहद सरल बना दिया है, लेकिन क्या यह हमारी फिजूलखर्ची को भी बढ़ा रहा है? दिल्ली की एक कंटेंट क्रिएटर ने इस सवाल का उत्तर खोजने के लिए अपने जीवन में एक प्रयोग किया।
फिजूलखर्ची पर नियंत्रण
फिजूलखर्ची पर लगा लगाम
सदफ ने बताया कि यूपीआई से भुगतान करना इतना सहज था कि वह अक्सर यह नहीं समझ पाती थी कि दिनभर में कितने पैसे खर्च हो गए। मोबाइल निकालकर स्कैन करना और लेन-देन करना इतना आसान था कि छोटी-छोटी खरीदारी कब बड़ी रकम में बदल जाती थी, इसका पता महीने के अंत में ही चलता था। लेकिन जब वह नकद में भुगतान करती थी, तो हर बार पर्स खोलना और नोट गिनना पड़ता था।
यूपीआई ट्रांजैक्शन का प्रभाव
छोटे-छोटे यूपीआई ट्रांजैक्शन का हिसाब
इस प्रयोग का प्रभाव केवल खरीदारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके पूरे बजट पर भी इसका असर पड़ा। उन्होंने पहले से तय किया कि एक दिन में कितनी राशि खर्च करनी है। जैसे-जैसे पर्स हल्का होता गया, वैसे-वैसे अन्य खर्च अगले दिन के लिए टलते गए। पहले जहां दर्जनों छोटे-छोटे यूपीआई ट्रांजैक्शन का हिसाब रखना कठिन था, वहीं अब हर खर्च उनकी नजर में था। इसका परिणाम यह हुआ कि महीने के अंत में खर्च पर नियंत्रण बना और बचत में भी वृद्धि हुई।
सोशल मीडिया पर चर्चा
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
सदफ का यह अनुभव जब सोशल मीडिया पर साझा हुआ, तो हजारों लोगों ने अपनी राय दी। कई यूजर्स ने स्वीकार किया कि उन्होंने भी ऐसा ही अनुभव किया है। उनका कहना था कि डिजिटल भुगतान ने खर्च करना इतना आसान बना दिया है कि कभी-कभी जरूरत और इच्छा के बीच की सीमा मिट जाती है। वहीं, कुछ लोगों ने कहा कि आज की तेज़-तर्रार जिंदगी में पूरी तरह से नकद पर निर्भर रहना संभव नहीं है।
