भारत के साइलेंट विलेज: जम्मू-कश्मीर का अनोखा धदकई गांव
धदकई गांव की अनोखी कहानी
नई दिल्ली: आपने अक्सर जम्मू-कश्मीर की अद्भुत सुंदरता के बारे में सुना होगा, जिसे भारत का स्विट्जरलैंड कहा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में एक ऐसा गांव है, जिसे भारत के साइलेंट विलेज के नाम से भी जाना जाता है? इस गांव का नाम धदकई है, जहां बड़ी संख्या में लोग जन्म से ही सुनने और बोलने में असमर्थ हैं। आइए जानते हैं इस गांव की विशेषताओं के बारे में।
गांव का स्थान और जनसंख्या
यह गांव जम्मू से लगभग 260 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और यहां मुख्य रूप से गुज्जर मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं। धदकई गांव की कुल आबादी लगभग 2,000 है, जिसमें 90 से अधिक लोग मूक और बधिर हैं। यहां के 105 परिवारों में से आधे से अधिक परिवारों में कम से कम एक सदस्य इस स्थिति का सामना कर रहा है। कई परिवारों में तो अधिकांश बच्चे भी इसी स्थिति के साथ जन्म लेते हैं। इसके बावजूद, गांव के लोग अपनी जिंदगी सामान्य तरीके से जीते हैं और इशारों की भाषा में संवाद करते हैं।
सांकेतिक भाषा का विकास
इस स्थिति के कारण, गांव के निवासियों ने अपनी एक सांकेतिक भाषा विकसित कर ली है। जो लोग सामान्य रूप से सुन और बोल सकते हैं, वे भी इस भाषा में कुशल हैं। यही कारण है कि गांव में आपसी संवाद बिना किसी कठिनाई के होता है।
जेनेटिक कारणों का प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति के पीछे जेनेटिक कारण प्रमुख हैं। लंबे समय तक सीमित समुदाय में विवाह होने के कारण कुछ दुर्लभ जीन पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते रहे हैं, जिससे गांव में मूक-बधिर बच्चों का जन्म अधिक हो रहा है। इस विषय पर समय-समय पर चिकित्सा विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं द्वारा अध्ययन भी किया गया है। इस प्रकार, धदकई गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ कठिन परिस्थितियों में एकजुटता के लिए भी जाना जाता है।
