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दुर्गा पूजा की अनोखी परंपरा: धेनुआ गांव की विशेषता

पश्चिम बंगाल के धेनुआ गांव में दुर्गा पूजा की एक अनोखी परंपरा है, जहां महालया के दिन सभी प्रमुख अनुष्ठान एक साथ संपन्न होते हैं। यहां मां दुर्गा के साथ उनकी सखियां जया और विजया की पूजा की जाती है, जो इसे अन्य पूजा स्थलों से अलग बनाती है। इस विशेष आयोजन में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या शामिल होती है, जो पूरे साल इसका इंतजार करते हैं। जानें इस अनूठी परंपरा के बारे में और कैसे यह स्थानीय आस्था का प्रतीक बन गई है।
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धेनुआ गांव में दुर्गा पूजा का अनूठा उत्सव


पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का पर्व अपनी भव्यता और विशेष परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां कई धार्मिक स्थल हैं, जहां मां दुर्गा की पूजा सदियों से होती आ रही है। आसनसोल के हीरापुर क्षेत्र के धेनुआ गांव में दुर्गा पूजा की एक अनोखी परंपरा है, जो इसे अन्य पूजा स्थलों से अलग बनाती है।


कालीकृष्ण आश्रम में विशेष अनुष्ठान

दामोदर नदी के किनारे स्थित कालीकृष्ण आश्रम में महालया के दिन सप्तमी, अष्टमी, नवमी और विसर्जन जैसे सभी प्रमुख अनुष्ठान एक साथ संपन्न होते हैं। यहां मां दुर्गा के साथ गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा नहीं की जाती, बल्कि उनकी सखियों जया और विजया की पूजा की जाती है।


आश्रम की स्थापना का इतिहास

धेनुआ गांव में आगमनी दुर्गा पूजा की परंपरा संत तेजानंद ब्रह्मचारी से जुड़ी हुई है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, 1937 में दामोदर नदी के किनारे कालीकृष्ण आश्रम की स्थापना हुई थी। इसके बाद से 1979 से यहां विशेष आगमनी दुर्गा पूजा का आयोजन बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।


मां दुर्गा के साथ जया और विजया

इस पूजा की एक विशेषता यहां स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा है। आमतौर पर बंगाल में दुर्गा पूजा में मां के साथ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं होती हैं, लेकिन धेनुआ गांव में मां दुर्गा के साथ उनकी सखियां जया और विजया तथा सिंह का स्वरूप होता है।


स्थानीय मान्यता के अनुसार, जब धरती पर बीमारियों और असुरों का आतंक बढ़ा, तब मां दुर्गा स्वर्ग से धरती पर आईं। उनकी रक्षा के लिए जया और विजया ने भी उनके साथ आने का संकल्प लिया। इसी मान्यता के आधार पर यहां मां दुर्गा के साथ जया और विजया की पूजा की जाती है।


एक दिन में सभी अनुष्ठान का आयोजन

पूजा से जुड़े नारायण दत्त के अनुसार, यह आयोजन साल में केवल एक बार होता है, और श्रद्धालु पूरे साल इसका इंतजार करते हैं। महालया के दिन ही सप्तमी, अष्टमी और नवमी से जुड़े अनुष्ठान पूरे किए जाते हैं, और इसी दिन विसर्जन की प्रक्रिया भी संपन्न होती है। श्रद्धालु इस परंपरा को मां दुर्गा के विशेष आशीर्वाद से जोड़कर देखते हैं।


श्रद्धालुओं की भीड़

परिमल भंडारी के अनुसार, इस पूजा को लेकर लोगों में पूरे साल उत्साह बना रहता है। महालया के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कालीकृष्ण आश्रम पहुंचते हैं। पूजा संपन्न होने के बाद से ही लोग अगले साल के आयोजन का इंतजार करने लगते हैं।


धार्मिक परंपरा का संगम

दामोदर नदी के किनारे पुराने शिव मंदिर के पास होने वाला यह आयोजन स्थानीय आस्था और धार्मिक परंपरा का अनोखा संगम है। महालया के दिन पितृपक्ष की समाप्ति और देवी पक्ष की शुरुआत के साथ मां दुर्गा के आगमन का उत्सव मनाया जाता है। इस दौरान पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल में डूब जाता है।


धेनुआ गांव की इस विशेष दुर्गा पूजा में आसनसोल और दुर्गापुर के अलावा पश्चिम बर्धमान, पूर्व बर्धमान, बांकुड़ा और पुरुलिया जैसे क्षेत्रों से भी श्रद्धालु आते हैं। झारखंड से भी बड़ी संख्या में लोग यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। महालया के दिन प्रमुख अनुष्ठानों को पूरा करने और मां के साथ जया-विजया की पूजा करने की अनोखी परंपरा के कारण यह आयोजन दूर-दूर तक अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।