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निर्जला एकादशी: महत्व, पूजा विधि और कथा

निर्जला एकादशी, जो ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है, भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन भक्तजन अन्न और जल का त्याग करते हैं, जिससे उन्हें सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। इस लेख में हम निर्जला एकादशी के महत्व, पूजा विधि और इसकी कथा के बारे में जानेंगे। जानें कैसे इस दिन दान और पुण्य का कार्य करना चाहिए और क्यों यह व्रत विशेष माना जाता है।
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निर्जला एकादशी: महत्व, पूजा विधि और कथा

निर्जला एकादशी का महत्व

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे निर्जला एकादशी कहा जाता है, भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन भक्तजन अन्न और जल का त्याग करते हुए व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। इसे भी भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि महाभारत के भीमसेन ने इसे रखा था। इस दिन दान का विशेष महत्व है, जहां लोग गरीबों को जल, वस्त्र, फल और अन्न का दान करते हैं। इस वर्ष निर्जला एकादशी 25 जून, गुरुवार को मनाई जाएगी।


एकादशी का महत्व

हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण है। साल में चौबीस एकादशियां होती हैं, जबकि अधिकमास में इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इनमें से ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को सर्वोत्तम माना जाता है। यह व्रत स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अनिवार्य है, क्योंकि यह मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा प्रदान करता है। कुछ भक्त इस दिन एक भुक्त व्रत भी रखते हैं, जिसमें वे सायं को दान-दर्शन के बाद फल और दूध का सेवन करते हैं।


निर्जला एकादशी पूजा विधि

निर्जला एकादशी पूजा विधि

एकादशी तिथि के सूर्योदय से द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन का त्याग किया जाता है। इसके बाद दान और पुण्य का कार्य किया जाता है। इस दिन सबसे पहले भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवायः' मंत्र का जाप करें। व्रति को जल से कलश भरकर उस पर सफेद वस्त्र रखना चाहिए और उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान देना चाहिए। इस दिन कलश और गौ दान का विशेष महत्व है।


निर्जला एकादशी व्रत विधान

निर्जला एकादशी व्रत विधान

इस दिन पानी का सेवन नहीं किया जाता, जिससे यह व्रत कठिनाई और संयम का प्रतीक बन जाता है। निर्जल व्रत करते हुए भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व है। इस दिन अन्न, वस्त्र, छतरी, जूते, पंखी और फल आदि का दान करना चाहिए। जल कलश का दान करने से वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है।


निर्जला एकादशी की कथा

निर्जला एकादशी व्रत कथा

महर्षि व्यास ने पांडवों को एकादशी के व्रत का विधान बताया। जब भीमसेन ने भोजन के दोषों की चर्चा की, तो उन्होंने कहा कि वह बिना खाए नहीं रह सकते। महर्षि व्यास ने उन्हें सलाह दी कि वे ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को केवल एक व्रत करें, जिसमें पानी पीने का दोष नहीं होता। इस प्रकार, भीमसेन ने इस व्रत को अपनाया, जिससे इसे भीमसेनी एकादशी कहा जाता है।