शनि प्रदोष व्रत: महत्व, पूजा विधि और लाभ
शनि प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है, जो हर महीने दो बार मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा से सुख, समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है। जानें इस व्रत की पूजा विधि, मुहूर्त और इससे जुड़ी पौराणिक कथा। इस व्रत को करने से शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है और कुंडली में शनि दोष भी दूर होता है। जानें कैसे करें पूजा और किन बातों का रखें ध्यान।
| Jun 27, 2026, 11:54 IST
शनि प्रदोष व्रत का महत्व
आज शनि व्रत है, इस दिन प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करने से सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है। शनि प्रदोष व्रत से सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। शनिवार को होने के कारण इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। आइए, हम आपको इस व्रत का महत्व और पूजा विधि के बारे में जानकारी देते हैं।
शनि प्रदोष व्रत के बारे में जानें
हिंदू धर्म में शनि प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, यह व्रत इस बार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाएगा। शनिवार को त्रयोदशी होने के कारण इसका महत्व और बढ़ जाता है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा का महत्व है। संतान प्राप्ति के लिए भी यह व्रत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन सूर्यास्त के समय भगवान शिव का पूजन किया जाता है।
शनि प्रदोष व्रत पूजा मुहूर्त 2026
शास्त्रों के अनुसार, शनि प्रदोष पर पूजा का मुहूर्त महत्वपूर्ण होता है। जो लोग इस व्रत का पालन करते हैं, उनके लिए पूजा का समय शाम 7:23 बजे से शुरू होगा और रात 9:23 बजे समाप्त होगा। प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है।
शनि प्रदोष व्रत की पूजा विधि
पंडितों के अनुसार, इस व्रत में सूर्यास्त के समय का विशेष महत्व होता है। सूर्यास्त से लगभग डेढ़ घंटे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। प्रदोष काल में भगवान शिव, माता पार्वती और नंदी जी का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करें। पूजा के दौरान "ॐ नमः शिवाय" का जाप करें। शिव पुराण में वर्णित शनि प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें। पूरे दिन उपवास रखना सर्वोत्तम है, लेकिन यदि संभव न हो तो फलाहार या साबूदाना और ताजे फलों का सेवन कर सकते हैं।
शनि प्रदोष व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर महीने दो प्रदोष व्रत होते हैं। एक शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी पर और दूसरा कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी पर। प्रदोष व्रत भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित है और इसे करने से सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। जब यह व्रत शनिवार को होता है, तो इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस व्रत से भगवान शिव और शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है।
शनि प्रदोष व्रत पर शनि देव को प्रसन्न करने के उपाय
पंडितों के अनुसार, झूठ, क्रोध और अपशब्दों से बचना शुभ माना जाता है। मेहनत, समय की पाबंदी और बुजुर्गों का सम्मान शनि से जुड़े महत्वपूर्ण आचरण हैं। शनि प्रदोष व्रत के दिन शनि मंदिर जाकर सरसों के तेल का दीपक जलाएं और श्रद्धा से “ॐ शं शनैश्चराय नमः” का जाप करें। पीपल के नीचे दीपदान करना भी शुभ है। जरूरतमंदों को काले तिल, उड़द दाल, कंबल या भोजन का दान करें।
शनि प्रदोष से जुड़ी पौराणिक कथा
प्राचीन काल में एक सेठ और सेठानी धन-धान्य से परिपूर्ण थे, लेकिन संतान न होने के कारण दुखी थे। उन्होंने संन्यास लेने का निश्चय किया और तीर्थयात्रा पर निकले। मार्ग में उन्हें ऋषि शांडिल्य मिले, जिन्होंने उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने का सुझाव दिया। व्रत के प्रभाव से सेठानी को एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। इस प्रकार से शनिदेव की कृपा से संतान सुख और धन-वैभव की प्राप्ति के लिए शनि प्रदोष व्रत की परंपरा शुरू हुई।
शनि प्रदोष के दिन शिवलिंग पर अर्पित करें ये सामग्री
पूजा के दौरान सबसे पहले शिवलिंग पर शुद्ध जल और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद पंचामृत अर्पित करें। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और सफेद चंदन अर्पित करें। अंत में दीप और धूप जलाकर ‘ॐ नमः शिवाय’ का 108 बार जाप करें। यह सामग्री भगवान शिव को प्रिय होती है।
शनि प्रदोष पर इन गलतियों से बचें
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर हल्दी, सिंदूर और तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिए। व्रत के दिन सात्विकता बनाए रखें और मांस-मदिरा से दूर रहें। व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद करें।
शनि प्रदोष व्रत के दिन विशेष ध्यान देने योग्य बातें
शनि प्रदोष व्रत का दिन खास होता है, इसलिए इस दिन शिवलिंग पर हल्दी, सिंदूर और तुलसी पत्र न चढ़ाएं। बेलपत्र ताजा और साफ होना चाहिए। पूजा के समय क्रोध न करें और प्रदोष काल में पूजा को जल्दबाजी में न करें। इस दिन तामसिक भोजन और शराब से दूर रहें।
