सावन की शिवरात्रि: शिव पूजा का महत्व और विधि
सावन की शिवरात्रि का महत्व
नई दिल्ली: आज सावन की शिवरात्रि मनाई जा रही है। इस दिन भगवान शिव की पूजा से भक्तों की इच्छाएं पूरी होने की संभावना होती है। यदि आप पूरी विधि से पूजा नहीं कर पा रहे हैं, तो केवल जल और दूध चढ़ाकर भी साधारण पूजा की जा सकती है। शिवलिंग पर जलाभिषेक करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भगवान शिव को ठंडक देने वाली वस्तुएं जैसे जल, दूध, दही और घी चढ़ाने की परंपरा है।
अभिषेक का अर्थ
शिवजी पर अभिषेक का अर्थ है शिवलिंग पर जल चढ़ाना। भगवान शिव का एक नाम रुद्र भी है, इसलिए इसे रुद्राभिषेक भी कहा जाता है। आइए जानते हैं कि शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाने का क्या महत्व है।
समुद्र मंथन की कथा
समुद्र मंथन की कथा:
प्राचीन काल में देवताओं और दानवों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया था। इस मंथन से 14 रत्न प्राप्त हुए, जिनमें कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, महालक्ष्मी, धन्वंतरि और अमृत कलश शामिल थे। लेकिन सबसे पहले हलाहल नाम का विष निकला, जिससे सभी जीव संकट में पड़ गए। भगवान शिव ने उस विष को पी लिया और उसे गले से नीचे नहीं जाने दिया, जिससे उनका गला नीला हो गया और उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा।
शिवजी को ठंडक पहुंचाने की परंपरा
विष के कारण शिवजी के शरीर में जलन होने लगी। देवताओं ने उन्हें ठंडा जल अर्पित किया, जिससे शिवजी को शीतलता मिली। तब से शिवलिंग पर ठंडी चीजें जैसे जल, दूध, दही और घी चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। ठंडक के लिए शिवजी ने चंद्रमा को अपने सिर पर धारण किया है।
जल-दूध चढ़ाते समय ध्यान देने योग्य बातें
जल-दूध चढ़ाते समय ध्यान रखने वाली बातें:
शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए सोने, चांदी, पीतल या तांबे के लोटे का उपयोग करना चाहिए। दूध के लिए चांदी का बर्तन सर्वोत्तम माना जाता है। यदि चांदी का लोटा उपलब्ध नहीं है, तो मिट्टी के कलश का भी उपयोग किया जा सकता है। स्टील, एल्युमिनियम या लोहे के बर्तन का उपयोग न करें, क्योंकि ये पूजा के लिए शुभ नहीं माने जाते। लोटे में जल या दूध भरकर पतली धारा के रूप में शिवलिंग पर चढ़ाएं और चढ़ाते समय "ॐ नमः शिवाय" का जाप करते रहें।
