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वाघ बकरी टी ग्रुप के प्रमुख पीयूष देसाई का निधन, चाय उद्योग में छाया शोक

वाघ बकरी टी ग्रुप के चेयरमैन पीयूष देसाई का 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने चाय उद्योग में छह दशकों तक महत्वपूर्ण योगदान दिया और गांधीवादी सिद्धांतों को अपने व्यवसाय में अपनाया। उनके निधन से चाय उद्योग और गांधीवादी विचारधारा में शोक की लहर दौड़ गई है। जानें उनके जीवन और कार्यों के बारे में।
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पीयूष देसाई का निधन

अहमदाबाद: देश के प्रसिद्ध चाय ब्रांड 'वाघ बकरी टी ग्रुप' के चेयरमैन और प्रतिष्ठित उद्योगपति पीयूषभाई देसाई का 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया। कंपनी ने उनके निधन की पुष्टि करते हुए एक आधिकारिक बयान जारी किया। पीयूषभाई ने व्यापार को गांधीवादी सिद्धांतों, परोपकार और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ जोड़कर छह दशकों से अधिक समय तक चाय उद्योग में योगदान दिया। उन्होंने वाघ बकरी चाय को गुजरात से बाहर निकालकर पूरे देश में एक मजबूत पहचान दिलाई।


छह दशकों का अनुभव और टी-टेस्टर के रूप में पहचान

ग्रुप द्वारा जारी शोक संदेश में कहा गया है कि पीयूष देसाई को चाय के गहन ज्ञान और उच्च गुणवत्ता के लिए जाना जाता था। वह एक सफल उद्योगपति होने के साथ-साथ एक शीर्ष श्रेणी के 'टी-टेस्टर' भी थे। गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति सुदर्शन अयंगर ने उन्हें याद करते हुए कहा कि पीयूषभाई एक 'सेल्फ-मेड' उद्यमी थे, जिन्होंने महात्मा गांधी के सिद्धांतों को अपने व्यवसाय और व्यक्तिगत जीवन में पूरी तरह से उतारा।


ब्रांड 'वाघ बकरी' का नामकरण

पीयूष देसाई अक्सर अपने ब्रांड 'वाघ बकरी' के अनूठे नाम के पीछे के दार्शनिक संदेश को साझा करते थे। उनका मानना था कि जिस घाट पर बाघ और बकरी बिना किसी डर के पानी पी सकें, वह एक आदर्श और अहिंसक समाज का प्रतीक है। यह नाम केवल व्यापारिक पहचान नहीं थी, बल्कि इसके माध्यम से वह महात्मा गांधी के अहिंसा और सौहार्द के संदेश को फैलाने का प्रयास कर रहे थे। उनके परिवार का गांधीजी से संबंध तब शुरू हुआ जब उनके दादाजी की मुलाकात दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी से हुई थी।


गांधी साहित्य के प्रसार में योगदान

पीयूषभाई का गुजरात विद्यापीठ और गांधीवादी विचारधारा से जुड़े विभिन्न सामाजिक अभियानों में गहरा जुड़ाव था। वह 'अनुवाद फाउंडेशन' के संस्थापक निदेशकों में से एक थे, जिसे गुजरात विद्यापीठ के तत्कालीन कुलाधिपति नारायण देसाई के साथ मिलकर स्थापित किया गया था। इस फाउंडेशन का उद्देश्य गांधीजी के अप्रकाशित कार्यों और महादेवभाई देसाई की डायरियों का अनुवाद करना था। उनके निधन से चाय उद्योग और गांधीवादी विचार जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।