2030 तक बिजली उत्पादन में एआई का उपयोग 65 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान
बिजली उत्पादन में एआई का बढ़ता उपयोग
नई दिल्ली, 6 अगस्त: भारत के बिजली उत्पादन क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग 2030 तक 35 प्रतिशत से बढ़कर 65 प्रतिशत होने की संभावना है, और यह संचालन क्षमता का एक महत्वपूर्ण आधार बन जाएगा। यह जानकारी एक अध्ययन रिपोर्ट में सामने आई है। ‘द एनर्जी एंड क्लाइमेट इनिशिएटिव सोसायटी’ (ईएनसीआईएस) द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, वर्तमान में लगभग 35 प्रतिशत बिजली उत्पादक कंपनियों ने अपने मुख्य संचालन में एआई को शामिल किया है, और यह संख्या तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।
यह अध्ययन दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु और चेन्नई में उपयोगिता और प्रौद्योगिकी कंपनियों के 250 पेशेवरों के बीच किया गया। इसमें से लगभग 70 प्रतिशत पेशेवरों का मानना है कि अगले पांच वर्षों में बिजली उत्पादन क्षेत्र में एआई का उपयोग दक्षता बढ़ाने का सबसे बड़ा अवसर प्रदान करेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में डिजिटल बुनियादी ढांचे के विकास के साथ यह प्रवृत्ति और भी मजबूत हो रही है।
डेटा सेंटर की क्षमता 2025 में 1.5 गीगावाट से बढ़कर 2030 तक 7 गीगावाट होने का अनुमान है, जबकि केवल डेटा सेंटर से बिजली की मांग 2031-32 तक 13.56 गीगावाट तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, अदाणी और रिलायंस जैसे प्रमुख समूह 2035 तक एआई आधारित बुनियादी ढांचे और नवीकरणीय ऊर्जा में 210 अरब डॉलर से अधिक निवेश करने का वादा कर चुके हैं, जो स्मार्ट और टिकाऊ ऊर्जा की दिशा में बदलाव को दर्शाता है। अध्ययन से यह भी पता चलता है कि एआई के उपयोग में भविष्यवाणी-आधारित परिसंपत्ति प्रबंधन और सक्रिय रखरखाव सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभर रहे हैं।
अधिकांश पेशेवरों ने कहा कि एआई का उपयोग खराबी का पहले पता लगाने, बिजली आपूर्ति में रुकावट की घटनाओं को कम करने और उपकरणों की उम्र बढ़ाने में मदद करेगा। ईएनसीआईएस के ‘भारत इलेक्ट्रिसिटी काउंसिल’ के मानद चेयरमैन भूपिंदर सिंह भल्ला ने कहा, “वर्ष 2030 तक पारंपरिक और नवीकरणीय ऊर्जा के बीच निर्णायक अंतर नहीं होगा, बल्कि सीखने वाली और केवल संचालन करने वाली परिसंपत्तियों के बीच होगा।”
ईएनसीआईएस एक से तीन सितंबर तक राष्ट्रीय राजधानी में ‘भारत इलेक्ट्रिसिटी, पावरजेन इंडिया और इंडियन यूटिलिटी वीक’ का आयोजन कर रहा है, जिसमें 15,000 से अधिक पेशेवरों, 30 से अधिक देशों के लगभग 250 प्रदर्शकों और 150 उद्योग विशेषज्ञों एवं नीति-निर्माताओं के शामिल होने की उम्मीद है।
