भारत के जीडीपी आंकड़ों पर उठते सवाल: क्या सरकार को आलोचना का स्वागत करना चाहिए?
जीडीपी आंकड़ों की आलोचना और सरकार की प्रतिक्रिया
यदि जीडीपी के आंकड़ों का उद्देश्य राजनीतिक खुशहाली का निर्माण नहीं है, तो सरकार को आलोचनाओं और प्रश्नों का स्वागत करना चाहिए।
नरेंद्र मोदी हाल ही में किर्गिजिस्तान में एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल हुए थे, जहां उन्होंने वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों को लेकर खुशी का इजहार किया। इस बीच, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कुछ अर्थशास्त्रियों पर आरोप लगाया कि वे टीवी चैनलों पर आकर देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह स्पष्ट है कि गोयल का इशारा पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की ओर था।
गर्ग ने हाल ही में जारी जीडीपी आंकड़ों में कुछ विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। सरकार ने 2025-26 की पहली तिमाही के लिए जीडीपी का अनुमान 86 लाख करोड़ रुपये लगाया था, लेकिन नई गणना में इसे 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। इस गिरावट के कारण, इस वर्ष की पहली तिमाही में अनुमानित 88 लाख करोड़ की नोमिनल जीडीपी पिछले वर्ष की तुलना में 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ी हुई दिखाई देती है।
हालांकि, सरकार ने स्पष्टीकरण जारी किया है, लेकिन इससे गर्ग के उठाए गए प्रश्नों का समाधान नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल के बयान ने गर्ग की चिंताओं को और भी बल दिया है।
भारत में, विशेषकर मोदी सरकार के कार्यकाल में, आर्थिक आंकड़ों की गणना पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। नई सीरीज में मैनुफैक्चरिंग के आकलन को लेकर कई अर्थशास्त्रियों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। इसलिए, यदि जीडीपी आंकड़ों का उद्देश्य वास्तविकता को दर्शाना है, तो सरकार को आलोचनाओं का स्वागत करना चाहिए। इससे विकास की नीतियों को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। लेकिन यदि सरकार केवल खुशहाली की झूठी कहानियां फैलाना चाहती है, तो उसे समझना चाहिए कि अब वास्तविकताएं सामने आ चुकी हैं।
