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Essel Group के सुभाष चंद्रा का दिवाला मामला: गारंटी और उधारी के बीच का विवाद

Essel Group के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा ने अपने दिवाला मामले में गारंटी और उधारी के बीच के विवाद पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने नाम पर कोई कर्ज नहीं लिया, बल्कि वे कई कंपनियों के लिए गारंटर थे। इस मामले में राजनीतिक आरोपों और कानूनी जटिलताओं के बीच, क्या असली सच सामने आएगा? जानें इस जटिल मामले की पूरी कहानी।
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सुभाष चंद्रा का दिवाला मामला

कॉर्पोरेट क्षेत्र से एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। जहां एक ओर 22 हजार करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले केवल 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष ने इसे ‘99.97 प्रतिशत हेयरकट’ करार देते हुए सवाल उठाए हैं। इस बीच, Essel Group के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखकर बहस को नया मोड़ दिया है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सुभाष चंद्रा ने वास्तव में हजारों करोड़ रुपये का कर्ज लिया था, या यह मामला व्यक्तिगत गारंटी का है, जिसे राजनीतिक बहस में ‘लोन माफी’ के रूप में पेश किया जा रहा है?




डॉ. सुभाष चंद्रा ने आज Instagram पर लाइव आकर अपने व्यक्तिगत दिवाला मामले से संबंधित आंकड़े साझा किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने अपने नाम पर एक भी रुपये का कर्ज नहीं लिया। उनके अनुसार, वे कई कंपनियों के लिए केवल व्यक्तिगत गारंटर थे। उन्होंने बताया कि वे लगभग 18 से 20 कंपनियों के लिए गारंटर बने थे, जो सभी Essel Group से जुड़ी थीं।


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इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या उधारकर्ता और गारंटर को एक ही तराजू पर तौला जा सकता है। डॉ. चंद्रा के अनुसार, उधारकर्ता वह होता है जो पैसा लेता है, जबकि गारंटर वह है जो ऋणदाता को भुगतान की गारंटी देता है। उनका कहना है कि कंपनियों ने विस्तार और रोजगार सृजन के लिए कर्ज लिया था, न कि व्यक्तिगत उपयोग के लिए।




हालांकि, डॉ. चंद्रा ने गारंटी देने के अपने निर्णय को अपनी “सबसे बड़ी गलती” बताया। उन्होंने कहा कि शायद यही निर्णय उन्हें इस स्थिति में लाया। उन्होंने यह भी कहा कि जिन कंपनियों के लिए उन्होंने गारंटी दी, वे उनके परिचित थे।




विवाद केवल गारंटी और उधारकर्ता के बीच के अंतर तक सीमित नहीं है। NCLT ने 25 अगस्त को डॉ. चंद्रा की पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी, जिसमें 6.25 करोड़ रुपये लेनदारों को और 25 लाख रुपये दिवाला प्रक्रिया की लागत के लिए प्रस्तावित किए गए हैं। दूसरी ओर, स्वीकृत दावों की राशि 22,006.57 करोड़ रुपये बताई गई है, जो विपक्ष के हमलों का आधार बन गई है।




कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस पर तीखा हमला किया और NCLT को लेकर कटाक्ष किया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसे साधारण ‘हेयरकट’ नहीं बल्कि ‘‘मुंडन’’ तक करार दिया। विपक्ष का सवाल है कि जब आम किसान छोटी रकम नहीं चुका पाता, तो इतनी बड़ी राशि के मामले में इतनी कम राशि वाली योजना कैसे स्वीकार की जा सकती है?




डॉ. चंद्रा का जवाब अलग है। उनका कहना है कि व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही में उनके खिलाफ वास्तविक दावा 22 हजार करोड़ नहीं, बल्कि 3,992 करोड़ रुपये का है। उन्होंने बताया कि करीब 620 करोड़ रुपये के दावों का पहले ही निस्तारण हो चुका है, और उधार लेने वाली इकाइयों ने 1,063 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का भुगतान करने की पेशकश की है।




तो असली सवाल क्या है? क्या 22,006 करोड़ रुपये का आंकड़ा व्यक्तिगत देनदारी का है या इसमें कानूनी विवादों का भी मूल्यांकन शामिल है? क्या 3,992 करोड़ और 22,006 करोड़ के बीच का अंतर इस राजनीतिक विवाद की जड़ है? क्या सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानबाजी में ‘लोन लेने’ और ‘गारंटी देने’ के कानूनी अंतर को महत्व दिया जा रहा है?




इस बीच, LIC Housing Finance, HDFC Bank और Union Bank of India जैसे कई लेनदारों ने NCLT की मंजूरी को चुनौती दी है। NCLAT ने इस चुनौती पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। HDFC Bank समेत कई बैंकों ने योजना का विरोध किया है, जिससे अंतिम कानूनी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।




डॉ. चंद्रा ने यह भी स्पष्ट किया है कि बैंकों ने कोई लोन माफ नहीं किया है और जो भी वैध बकाया है, उसका निपटान किया जाएगा। उन्होंने अपनी निजी संपत्ति के बारे में भी कहा कि चुनाव आयोग को दिए हलफनामे में उन्होंने कभी 39 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की थी, जो अब लगभग 31 करोड़ रुपये है।




सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया के बावजूद, डॉ. चंद्रा ने नया स्टार्टअप शुरू करने की योजना बनाई है। उनका कहना है कि वह कानून के दायरे में रहकर कुछ दोस्तों और साझेदारों के साथ नया उद्यम शुरू करेंगे।




इस प्रकार, सुभाष चंद्रा का मामला अब केवल एक कारोबारी दिवाला प्रक्रिया नहीं रह गया है। यह अब कानून, बैंकिंग व्यवस्था, व्यक्तिगत गारंटी, कॉरपोरेट कर्ज और राजनीतिक आरोपों के बीच एक बड़ी बहस बन चुका है। सवाल बहुत हैं और जवाब NCLAT की सुनवाई और आगे की कानूनी प्रक्रिया से स्पष्ट होंगे। लेकिन यह स्पष्ट है कि इस मामले को केवल “22 हजार करोड़ का कर्ज और 6.5 करोड़ की वापसी” कहकर समझना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। असली बहस इस बात पर है कि कर्ज किसने लिया, गारंटी किसने दी, वास्तविक व्यक्तिगत देनदारी कितनी है और कानून के तहत गारंटर की जिम्मेदारी कितनी दूर तक जाती है?