अल नीनो का खतरा: भारत में खाद्य महंगाई की चिंता बढ़ी
खाद्य उद्योग की चिंता: अल नीनो का प्रभाव
भारत के खाद्य क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने अगले वर्ष के लिए सतर्क रहने की सलाह दी है। प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने से अल नीनो की स्थिति मजबूत होने की संभावना है। इसका प्रभाव मानसून, तापमान और कृषि के लिए आवश्यक जल पर पड़ सकता है। यदि वर्षा कमजोर रही या गर्मी अधिक समय तक बनी रही, तो कई महत्वपूर्ण फसलों की उपज प्रभावित हो सकती है। खाद्य उद्योग के प्रतिनिधियों का मानना है कि इसका प्रभाव तुरंत नहीं, बल्कि 2027 में अधिक स्पष्ट हो सकता है। दालों की ऊंची कीमतें और चीनी तथा खाद्य तेल के उत्पादन में अनिश्चितता के चलते संभावित आपूर्ति संकट आम परिवारों के बजट पर दबाव डाल सकता है। हालांकि, कीमतों में वृद्धि की मात्रा मौसम, फसल उत्पादन, आयात और सरकारी नीतियों पर निर्भर करेगी।
दालों की फसल पर बाजार की नजर
इंडियन पल्सेज एंड ग्रेन्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बिमल कोठारी ने उद्योग की चिंताओं का जिक्र करते हुए कहा कि 2027 की स्थिति अगले कुछ महीनों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होगी। चने की रबी फसल दालों की आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित करती है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में पानी की कमी और सूखे की स्थिति ने चिंता को बढ़ा दिया है, क्योंकि ये चने की खेती के प्रमुख क्षेत्र हैं। अरहर, चना, उड़द और पीली मटर की कीमतों में पहले से ही वृद्धि देखी जा चुकी है। यदि अगली फसल कमजोर रहती है, तो बाजार में उपलब्धता कम होने और कीमतों में वृद्धि का दबाव बन सकता है।
चीनी की कीमतों में वृद्धि की संभावना
चीनी उद्योग भी आगामी दो उत्पादन सत्रों को लेकर सतर्क है। उद्योग के प्रतिनिधियों के अनुसार, 2026-27 और 2027-28 में उत्पादन और उपलब्धता के मोर्चे पर चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि जून से अक्टूबर 2027 के बीच चीनी की मिल-स्तरीय कीमतें 50 रुपये प्रति किलो से अधिक जा सकती हैं। यह एक अनुमान है, कोई निश्चित मूल्य नहीं। इसका वास्तविक प्रभाव गन्ने की उपज, वर्षा, उत्पादन लागत और बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर निर्भर करेगा। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि संभावित कमी से निपटने की तैयारी अगले छह महीनों में शुरू कर देनी चाहिए।
गर्मी और कमजोर बारिश से बढ़ सकती हैं चुनौतियाँ
मौसम विशेषज्ञों ने मजबूत अल नीनो के संभावित प्रभावों पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव माधवन राजीवन के अनुसार, आने वाली सर्दियाँ सामान्य से अधिक गर्म हो सकती हैं और उसके बाद प्री-मानसून अवधि में तेज गर्मी और लू का खतरा बढ़ सकता है। यदि तापमान ऊँचा रहा और जल की उपलब्धता कम हुई, तो खेतों में सिंचाई की मांग बढ़ेगी और फसलों पर गर्मी का दबाव पड़ेगा। फिर भी, अल नीनो का मतलब हर क्षेत्र में सूखा पड़ना तय नहीं है। इसका वास्तविक प्रभाव स्थानीय मौसम और वर्षा के पैटर्न से स्पष्ट होगा।
खाद्य तेल और पशुपालन क्षेत्र पर भी ध्यान
खाद्य तेल के मामले में भारत पहले से ही आयात पर निर्भर है। उद्योग के प्रतिनिधियों ने सोयाबीन और मूंगफली की उपज को लेकर चिंता व्यक्त की है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में जल की कमी से गन्ने की फसल भी प्रभावित होने की आशंका है। यदि घरेलू तिलहन उत्पादन घटता है, तो आयात की आवश्यकता बढ़ सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों का असर भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। पशुपालन क्षेत्र में भी चारे की लागत बढ़ने की चिंता है, जिसका प्रभाव दूध और अन्य उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है।
2027 से पहले तैयारी क्यों आवश्यक है
विशेषज्ञों की मुख्य चिंता यह है कि कमजोर फसल, कम भंडार और बढ़ती मांग एक साथ आने पर खाद्य महंगाई को नियंत्रित करना कठिन हो सकता है। सरकार और उद्योग के लिए फसल की निगरानी, पर्याप्त भंडारण, सिंचाई प्रबंधन और आवश्यकता पड़ने पर आयात की योजना बनाना महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल 2027 में खाद्य संकट निश्चित नहीं है, लेकिन मौसम से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण तैयारी आवश्यक मानी जा रही है।
