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आरबीआई ने संपत्ति वसूली के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए

भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए संपत्ति वसूली के नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन नियमों का उद्देश्य रिकवरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना और डिफॉल्ट मामलों में संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकना है। नए मानदंडों के तहत, डिफॉल्टर को संपत्ति की पुनर्विक्रय पर रोक लगाई गई है और संपत्तियों का निपटान अधिकतम सात वर्षों में करने का निर्देश दिया गया है। जानें इन दिशा-निर्देशों के पीछे के कारण और उनके प्रभाव के बारे में।
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आरबीआई के नए दिशा-निर्देश


भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकों, लघु वित्त बैंकों और एनबीएफसी के लिए संपत्तियों के प्रबंधन के संबंध में नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य रिकवरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना और डिफॉल्ट मामलों में संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकना है। नए मानदंडों के तहत बैंकों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट किया गया है।


डिफॉल्टर को संपत्ति की पुनर्विक्रय पर रोक

आरबीआई ने यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी बैंक ने कर्ज वसूली के दौरान किसी उधारकर्ता की संपत्ति अपने कब्जे में ली है, तो वह संपत्ति उसी डिफॉल्टर या उससे जुड़े किसी अन्य पक्ष को पुनः नहीं बेच सकता। केंद्रीय बैंक का कहना है कि बैंकों का प्राथमिक उद्देश्य ऋण वितरण होना चाहिए, न कि संपत्तियों का व्यापार करना। केवल विशेष परिस्थितियों में, जब ऋण गैर-निष्पादित परिसंपत्ति बन जाता है और कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, तब ही बैंक सुरक्षा के रूप में रखी गई संपत्ति का स्वामित्व प्राप्त कर सकते हैं।


सात साल में संपत्तियों का निपटान

आरबीआई ने निर्देश दिया है कि वसूली गई गैर-वित्तीय संपत्तियों का निपटान अधिकतम सात वर्षों के भीतर किया जाना चाहिए। इसके लिए बैंकों को सार्वजनिक नीलामी जैसे पारदर्शी तरीकों को प्राथमिकता देने के लिए कहा गया है। यदि किसी संपत्ति के बदले केवल आंशिक ऋण की भरपाई होती है, तो शेष राशि को पुनर्गठित ऋण माना जाएगा और उस पर संबंधित नियामकीय नियम लागू होंगे। इससे रिकवरी प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और जवाबदेह बनाने की उम्मीद है।


बोर्ड-अप्रूव नीति और रिपोर्टिंग व्यवस्था

केंद्रीय बैंक ने सभी बैंकों, स्मॉल फाइनेंस बैंकों और एनबीएफसी को संपत्तियों के अधिग्रहण और निपटान के लिए बोर्ड से अनुमोदित नीति तैयार करने का निर्देश दिया है। इसमें पात्रता, वसूली प्रक्रिया, परिसंपत्तियों की सीमा और समयबद्ध निपटान जैसे प्रावधान शामिल होंगे। इसके साथ ही, 30 सितंबर 2026 तक लंबित मामलों को 30 सितंबर 2027 तक नए नियमों के अनुरूप लाना होगा। आरबीआई ने यह भी सुनिश्चित किया है कि ऐसी परिसंपत्तियों को बैलेंस शीट में अलग शीर्षक के तहत दर्शाया जाएगा, जिससे वित्तीय रिपोर्टिंग अधिक पारदर्शी हो सके।