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उच्चतम न्यायालय ने पर्यावरणीय मंजूरी से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लिया

उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में केंद्र सरकार के 2021 के कार्यालय ज्ञापन को रद्द कर दिया, जो बिना पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के परियोजनाओं को मंजूरी देने की अनुमति देता था। इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ है कि पर्यावरणीय मंजूरी अनिवार्य है और इसे उल्लंघन के लिए स्थायी माध्यम के रूप में नहीं इस्तेमाल किया जा सकता। जानें इस फैसले के पीछे की वजह और इसके संभावित प्रभाव।
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महत्वपूर्ण निर्णय का सारांश

(फाइल फोटो के साथ) नई दिल्ली, 29 जुलाई: उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय में केंद्र सरकार के 2021 के कार्यालय ज्ञापन को रद्द कर दिया। इस ज्ञापन के तहत बिना पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के शुरू की गई परियोजनाओं को पूर्वप्रभावी पर्यावरणीय मंजूरी देने की व्यवस्था बनाई गई थी। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली की पीठ ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया। पीठ ने कहा कि यह निर्णय भविष्य के लिए लागू होगा और पहले से प्राप्त पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) वाली परियोजनाएं इससे प्रभावित नहीं होंगी।


पर्यावरणीय मंजूरी का महत्व

पीठ ने स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय ढांचे के तहत पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी अनिवार्य है। सामान्य परिस्थितियों में, परियोजनाएं पहले शुरू नहीं की जा सकतीं और बाद में मंजूरी नहीं ली जा सकती। न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार असाधारण परिस्थितियों में और व्यापक जनहित में वैध अधिसूचना के माध्यम से सीमित अवधि की राहत योजना ला सकती है। हालांकि, यह व्यवस्था कार्यपालिका के कार्यालय ज्ञापन (ओएम) के माध्यम से नहीं बनाई जा सकती।


संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग

पीठ ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत, उच्चतम न्यायालय यदि उचित समझे तो किसी परियोजना को कार्योत्तर (पोस्ट-फैक्टो) पर्यावरणीय मंजूरी दे सकता है। उच्चतम न्यायालय ने एक अप्रैल को पुनर्विचार याचिकाओं सहित सभी याचिकाओं पर निर्णय सुरक्षित रख लिया था। ये याचिकाएं उन परियोजनाओं से संबंधित थीं जो पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन कर रही थीं।